हाल ही में प्रदेश सरकार ने पिछड़े वर्ग के छात्रों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए मिलने वाली छात्रवृत्ति में भारी कटौती कर जो संकेत दिया है, वह भविष्य को लेकर चिंता उत्पन्न् करता है। एक अरसे से छात्रवृत्तियां होनहार छात्रों को अपने मुकाम तक पहुंचने के साधन के रूप में जानी जाती रही हैं। छात्रवृत्ति वह निवेश है, जो प्रतिभाशाली युवाओं के चहुंमुखी विकास के जरिए प्रदेश के विकास के लिए शासन करता आया है।

इसमें दोराय नहीं कि इंजीनियरिंग, फॉर्मेसी, एमबीए, एमसीए सहित लगभग सभी पाठ्यक्रम महंगे हो चुके हैं। निम्न और मध्यमवर्गीय परिवार अपने होनहार बच्चों के लिए बढ़ती जा रही फीस चुकाने में समर्थ नहीं होते। फलस्वरूप प्रतिभाएं अंधेरे में गुम हो जाती हैं। शासन ने 12 साल पुराने आदेश का हवाला देकर छात्रवृत्तियां घटाकर आधी तो कर दीं, लेकिन प्रदेश के विकास पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ना तय है। केंद्र के साथ चलने वाली देश की विकास यात्रा पर पड़ने वाले इस ग्रहण को रोका जाना चाहिए।

आरक्षण को लेकर प्रदेश सरकार अब भी कमोबेश दुविधा में है। ओबीसी छात्रों को मिलने वाली छात्रवृत्ति में कृपणता दिखाकर सरकार अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है। सचिव स्तर पर बैठे हुए अधिकारियों में आपसी समझ और सामंजस्य का अभाव दिखाई देता है। एक ओर सरकार हाईस्कूल और हायर सेकंडरी परीक्षा में फेल विद्यार्थियों के लिए 'रुक जाना नहीं" जैसी योजना के तहत परीक्षा उत्तीर्ण करवाने के लिए दूर की कौड़ी ढूंढ़कर ले आती है, वहीं बिना रुके उच्चतम अंकों से परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले मेधावी बच्चों की छात्रवृति कम कर उन पर सितर कर रही है। प्रदेश सरकार विज्ञापनों और बंद होने की कगार पर खड़ी असफल योजनाओं पर जो खर्च करती है, उसे आधा कर प्रतिभाशाली छात्रों को आगे बढ़ाने पर खर्च करना चाहिए। ऐसा करने पर सफल युवाओं में प्रदेश के प्रति लगाव पैदा होगा और प्रतिभा पलायन भी रुकेगा। प्रदेश सरकार इस सच्चाई से अनजान नहीं हो सकती या जानबूझकर आंखें नहीं मूंद सकती। हमारे युवा भविष्य में छलांग लगाने के लिए उत्सुक और तैयार हैं। उन्हें तलाश है तो सिर्फ सही अवसर और थोड़े से सहयोग की। ऐसे में सरकार का यह दायित्व है कि वह ऐसे बच्चों की सहायता करे और उन्हें पढ़ाई छोड़ने को मजबूर करने वाली परस्थितियों से लड़ने में सहयोग दे। वे जिस क्षेत्र में बढ़ना चाहते हैं, उसमें आगे बढ़ सकें और देश-प्रदेश को आगे ले जा सकें। यदि महज चंद हजार रुपयों की छात्रवृत्ति के अभाव में कोई मेधावी छात्र वो नहीं कर पाया, जो कर सकता था तो उसकी प्रतिभा देश के काम आने के बजाय कुंठित हो जाएगी। यदि ऐसा हुआ तो मुख्यमंत्री के 'हैप्पीनेस मंत्रालय" का कोई औचित्य नहीं रह जाएगा।

(लेखक सेवानिवृत्त प्राध्यापक हैं।)

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