स्वामी विवेकानंद के इस देश में अध्यापकों के आचरण को देखकर पीड़ा होती है। हमारे शिक्षक केवल विवेकानंद के शक्तिदायी विचारों से ही विद्यार्थियों में अपार जीवन मूल्यों का संचार कर सकते थे। वे चाहते तो विवेकानंद की इच्छा के अनुरूप दृढ़, तेजस्वी और आत्मविश्वास से भरे-पूरे तरुणों का संसार खड़ा कर सकते थे। किंतु तब बेहद निराशा होती है, जब शिक्षकों का एक बड़ा वर्ग हड़ताल, धरना और रैली की अपसंस्कृति को आगे बढ़ाते हुए अपना कर्तव्य भूलता दिखाई देता है।


ऐसा नहीं कि अच्छे शिक्षकों का अकाल है, किंतु शिक्षा पर व्यावसायिकता इतनी हावी हो चुकी है कि सच्ची मेहनत व समर्पण के साथ काम करने वाले शिक्षक अब हाशिए पर हैं। समाज में शील और सदाचार का कोई मापदंड नहीं बचा। मंदिर से भी ज्यादा पवित्र समझे जाने वाले विद्यालयों में किताबी सूचनाओं के अलावा वह सब गायब है, जो भविष्य निर्माण के लिए जरूरी है। विद्यालयों में स्वाभिमान जगाने के लिए कोई बेचैनी दिखाई नहीं देती। विवेकानंद चाहते थे कि हमारे बच्चे असफलताओं से सीखें। असफलता को वे जीवन का सौंदर्य कहते थे।


विवेकानंद की शिक्षा ने समूचे विश्व को निर्भयता का मंत्र दिया। उन्होंने गीता के अध्ययन की अपेक्षा फुटबॉल खेलने को अध्यात्म की ज्यादा उचित सीढ़ी बताया। जरूरत तो यह है कि भविष्य में उत्तरोत्तर आगे बढ़ने के लिए, ऊर्जावान युवाओं की चेतना को जगाने के लिए शिक्षक प्राणपण से योद्धा की तरह कूद पड़ें। किंतु फिर चूक हुई है। हमारी शिक्षा व्यवस्था ने नवांकुरों को भौतिकवादी चकाचौंध में धकेल कर उन्हें विशाल आसमान में स्वच्छंद उड़ान भरने से फिर वंचित कर दिया।


आज विवेकानंद होते तो ज्ञान की मशाल उठाने वाले शिक्षकों के हाथ में पुतला दहन के लिए माचिस देखकर व्यथित हो जाते। स्कूल में अध्यापन से जी चुराकर घर पर ट्यूशन करने वाले शिक्षकों को देखते तो क्या सोचते? कर्तव्यबोध और अनुशासन का भाव जगाने के लिए जिम्मेदार शिक्षकों को नियम विरुद्ध आचरण करते देखते तो क्या सोचते? यदि इन प्रश्नों पर हमारे शिक्षक सावधान होकर विचार करें और समर्पण के साथ फिर उठ खड़े हों, तो शिक्षा पर व्यय होने वाले सरकारी खजाने का सदुपयोग तो होगा ही, शिक्षकों की उस भूली-बिसरी भूमिका के प्रति फिर सम्मान जाग उठेगा। शिक्षक यह समझें कि जनमानस आज भी उन्हें राष्ट्र निर्माता के रूप में देखना और उनका विश्वास करना चाहता है।


(लेखक सेवानिवृत्त प्राध्यापक हैं)