मध्यप्रदेश में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। कभी बच्चों में कुपोषण को लेकर तो कभी महिलाओं के कमजोर स्वास्थ्य को लेकर। मगर यह जानना-सुनना हास्यास्पद है कि खुद प्रदेश सरकार में ओहदेदार मंत्री कहें कि 'हमारे सूबे में 85 फीसदी महिलाएं एनिमिक यानी कमजोर हैं।" दरअसल, जब वही व्यक्ति कमजोरी स्वीकार कर ले जो कि उसके लिए जिम्मेदार है, तो फिर सवाल उठाना ही बेमानी हो जाता है।


दरअसल, स्वास्थ्य एक ऐसा विषय है जो राज्य के हवाले है। ये राज्य सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि जिस जनता ने उसे चुनकर सत्ता के सूत्र सौंपे हैं, वह उसकी सेहत का ख्याल रखे। इसमें कोई संदेह नहीं कि मध्य प्रदेश सरकार ने लालिमा अभियान से लेकर अन्य तमाम योजनाएं लागू की हैं, ताकि प्रदेश में महिलाओं, बच्चों का कुपोषण और कमजोरी दूर हो, लेकिन यदि तमाम योजनाओं के बावजूद प्रदेश सरकार की ही मंत्री को भयावह आंकड़े स्वीकारना पड़ जाएं तो फिर योजनाओं की सफलता पर संदेह खड़ा होता है।

प्रदेश में प्रचुर अनाज, प्रोटीन से भरपूर सोयाबीन, उर्वरा भूमि में उगने वाली उन्न्त सब्जियों सहित अन्य तमाम खाने-पीने की वस्तुएं मौजूद हैं। कहने का आश्ाय यह कि मध्य प्रदेश ओडिशा नहीं है कि जहां अकाल जैसी स्थितियां बनती हों और जहां की भूमि अपने रहवासियों के पेट भरने लायक अन्न् ही न उपजा सके। फिर भी यदि यहां की महिलाएं और बच्चे रक्त अल्पता के शिकार हैं तो आश्चर्य होता है।


ऐसा नहीं कि प्रदेश सरकार ने प्रयास नहीं किए, किंतु जमीनी हकीकत देख ऐसा प्रतीत होता है कि ये प्रयास पूरी ईमानदारी से नहीं हुए। स्वास्थ्य महकमा कागजी रिपोर्ट्स में भले ये दावा करता हो कि 'विप्स" कार्यक्रम के तहत हर जिले में 6 से 15 वर्ष की आयु के बच्चों को तय मात्रा में आइएफए अनुपूरण खिलाया गया है। निश्चित रूप से दिया भी गया होगा, लेकिन ऐसा क्यों है कि सर्वेक्षणों में कुपोषित या एनिमिक की संख्या में कमी नहीं देखी जाती। यही हाल महिलाओं के मामले में भी होता है। सरकारी बजट में पैसे से लेकर दवाओं तक प्रचुर मात्रा में उपलब्ध करवाया जाता है। आयरन की गोलियों से लेकर अन्य तमाम जरूरी दवाएं भी खूब दी जाती हैं, मगर ये सब शासकीय मशीनरी की मोटी आंत में फंसकर रह जाता है। प्रदेश के कई इलाके ऐसे हैं, जहां रजिस्टरों में दर्ज है कि किसी हीराबाई या धापूबाई को आयरन की गोलियां दी गईं, लेकिन हकीकत में वहां कोई हीरा या धापूबाई होती ही नहीं है। ऐसे में वास्तविक एनिमिक महिलाएं वंचित रह जाती हैं और कृत्रिम कागजी महिलाएं रिपोर्ट्स में दर्ज हो जाती हैं। सरकार को अपने तंत्र को कसना होगा, वरना स्थिति बदलने वाली नहीं है।


(लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)