यह अच्छा हुआ कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उद्योग-व्यापार जगत के प्रतिनिधियों केबीच जाकर न केवल इस पर जोर दिया कि उनकी सरकार अर्थव्यवस्था को असंगठित से बदलकर संगठित व्यवस्था में ला रही है, बल्कि इस बारे में भी बताया कि भविष्य में और क्या कदम उठाए जाने हैं? आर्थिक सुस्ती के इस दौर में एसोचैम के मंच से प्रधानमंत्री के इस संबोधन का इसलिए विशेष महत्व है कि अगले आम बजट की तैयारी भी शुरू हो गई है। प्रधानमंत्री ने यह जो कहा कि उनकी सरकार ने इसके लिए भरसक प्रयास किए हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था निर्धारित नियमों से चले और तय लक्ष्यों की ओर बढ़े, उससे इनकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि बीते कुछ समय में कई ऐसे कदम उठाए गए हैं जिनके बारे में चर्चा तो खूब होती थी, लेकिन उन पर आगे नहीं बढ़ा जा रहा था।

इस सबके बावजूद इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि अर्थव्यवस्था को अनुशासित बनाने के लिए उठाए गए तमाम कदमों के बाद भी अनुकूल नतीजे सामने आना शेष हैं। जरूरी है सरकार यह देखे कि उसकी ओर से उठाए गए कदम जमीन पर क्या असर दिखा रहे हैं। इसी क्रम में उसे किस्म-किस्म की मिथ्या धारणाओं और अनावश्यक अंदेशों को भी दूर करना होना। ऐसा इसलिए, क्योंकि कई अंदेशे तो उन नियम-कानूनों को लेकर भी हैं, जिनका सरलीकरण किया गया है अथवा जिन्हें पारदर्शी बनाया गया है। यह सुनिश्चित किया ही जाना चाहिए कि उद्योग-व्यापार जगत हर तरह के अंदेशे से मुक्त हो। जब उद्योग-व्यापार जगत के छोटे-बड़े प्रतिनिधि अंदेशे से घिरते हैं या फिर शिकायती मुद्रा में आते हैं तो उससे आम जनता पर भी विपरीत असर पड़ता है। इससे एक नकारात्मक माहौल बनता है। ध्यान रहे कि कई बार आर्थिक सुस्ती की चौतरफा चर्चा उसे बढ़ाने का ही काम करती है।

प्रधानमंत्री ने जीएसटी में हो रहे लगातार सुधारों के उल्लेख के साथ ही यह भी रेखांकित किया कि आयकर विभाग के कामकाज को दुरुस्त करने के अतिरिक्त बैंकों की हालत सुधारने का काम भी जारी है। उन्होंने यह कहकर भी उद्योग जगत को आश्वस्त किया कि जरूरी नहीं कि कारोबार में असफलता के पीछे आर्थिक अपराध ही हो। चूंकि सरकार जो कह रही है, वह लगातार कर भी रही है, इसलिए इसका कोई कारण नहीं कि उद्योग-व्यापार जगत प्रधानमंत्री की बातों पर भरोसा न करे। यह केवल अनुमान ही नहीं है कि आगामी बजट में सरकार आर्थिक माहौल को बेहतर बनाने के कुछ और कदम उठाने जा रही है, बल्कि इसके संकेत भी दिए जा रहे हैं। अच्छा यही होगा कि जो कदम बजट के पहले उठाए जा सकते हों, वे उठा लिए जाएं।

Posted By: Ravindra Soni

fantasy cricket
fantasy cricket