चीन से आयात में कटौती के कदम उठाने से पहले सरकार और प्रमुख औद्योगिक संगठनों के बीच बातचीत जरूरी है, लेकिन यह भी समझने की जरूरत है कि आज जो स्थिति बनी, उसके लिए एक के बाद एक सरकारों के साथ कारोबार जगत भी जिम्मेदार है। चीन पर जरूरत से ज्यादा आर्थिक निर्भरता की चिंता तभी की जानी चाहिए थी, जब उसके साथ हमारा व्यापार घाटा बढ़ता जा रहा था। इस मामले में जैसा ढुलमुल रवैया हमारी सरकारों ने अपनाया, वैसा ही दुनिया के अन्य देशों की सरकारों ने भी। अड़ियल और अहंकारी चीन को दुनिया का कारखाना बनाने का काम तब भी होता रहा, जब यह दिख रहा था कि वह अनुचित तौर-तरीके अपनाने में लगा हुआ है। कायदे से विश्व को तभी चेतना चाहिए था, जब चीन अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करके अपने निर्यात को आकर्षक बनाने में लगा हुआ था। कम से कम भारत को तो खास तौर पर चेतना चाहिए था, क्योंकि वह उन वस्तुओं के लिए भी उस पर निर्भर हो रहा था, जो बहुत आसानी से देश में बनती थीं। दुर्भाग्य से न तो हमारे नीति-नियंता चेते और न ही कारोबार जगत के लोग। नतीजा यह हुआ कि बिजली की झालर, अगरबत्ती और धागे से लेकर गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां तक चीन से आने लगीं। आज यदि यह स्थिति है कि चीन से यकायक आयात रोक देने से तमाम भारतीय उद्योग कच्चे माल और उपकरणों की कमी से दो-चार हो जाएंगे तो इसके लिए हमारी आर्थिक-व्यापारिक नीतियां ही जिम्मेदार हैं। आखिर देशहित के प्रतिकूल साबित होने वाली आर्थिक-व्यापारिक नीतियां क्यों अपनाई गईं? क्या आर्थिक हितों की चिंता किए बगैर देश के हितों की रक्षा संभव है? क्या डब्ल्यूटीओ के प्रावधान यह कहते हैं कि कोई देश किसी अन्य देश पर जरूरत से ज्यादा निर्भर हो जाए?

यह ठीक है कि लद्दाख में चीन की धोखेबाजी के बाद हमारी आंखें खुल गईं, लेकिन अच्छा होता कि हम समय रहते चेतते और अपने परंपरागत उद्योगों की चिंता करते। कम से कम अब तो यह सुनिश्चित किया जाए कि चीन पर आर्थिक निर्भरता कम करने में कोई ढिलाई न बरती जाए। नि:संदेह चीन से होने वाले आयात में कटौती के पहले आवश्यक वस्तुओं के आयात के लिए वैकल्पिक बाजार खोजना होगा, लेकिन यह सही समय है कि भारतीय उद्योग जगत अपनी सामर्थ्य पहचाने और उन वस्तुओं के निर्माण के लिए कमर कसे जिनका उत्पादन पहले होता था अथवा जिन्हें आसानी से बनाया जा सकता है। इससे न केवल 'लोकल के लिए वोकल" का नारा सार्थक होगा, बल्कि उन देशों में भारतीय उत्पादों के लिए बाजार भी मिलेगा, जो चीन से दूरी बना रहे हैं।

Posted By: Ravindra Soni

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