बतौर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने पहली बार जम्मू-कश्मीर का दौरा किया और वहां उन्होंने यह कहकर अपने इरादे जाहिर कर दिए कि आतंकियों की फंडिंग रोकने और घुसपैठ-रोधी तंत्र को मजबूत बनाने के साथ ही आतंकवाद के खिलाफ सख्ती बरतने की नीति पर जोर दिया जाएगा। इसके साथ ही उन्होंने अलगाववादी नेताओं से जिस तरह वार्ता की संभावनाओं को खारिज किया, उससे यह साफ हुआ कि मोदी सरकार जल्दबाजी में कोई कदम उठाने से बचना चाह रही है और उसकी पहली प्राथमिकता घाटी के हालात सुधारने और उन्हें स्थायित्व देने पर है।

वास्तव में यही समय की मांग है। ऐसा कुछ प्रकट करने से बचा ही जाना चाहिए कि मोदी सरकार अलगाववादी नेताओं से बात करने के लिए व्यग्र है। इन नेताओं से बात करने में हर्ज नहीं, लेकिन पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि उनकी ओर से पाकिस्तानपरस्ती का परिचय न दिया जाए और वे भारतीय संविधान के दायरे में रहकर ही बातचीत करने के लिए राजी हों। वास्तव में उन्हें ज्यादा अहमियत दी भी नहीं जानी चाहिए। यह ठीक नहीं कि कश्मीर घाटी में असर रखने वाले राजनीतिक दल रह-रहकर केंद्र सरकार और अलगाववादी नेताओं में वार्ता की जरूरत जताते रहते हैं। ऐसा करके वे खुद अपनी अहमियत को ही कम करने का काम करते हैं। इससे भी खराब बात यह है कि वे कई बार अलगाववादियों की भाषा बोलने लगते हैं।

मोदी सरकार को इस पर भी ध्यान देना आवश्यक है कि यदि पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस जैसे दल हालात सुधारने में मददगार न बनें तो वे हालात बिगाड़ने का भी काम न करने पाएं। आज भले ही ये दोनों दल विधानसभा चुनाव जल्द कराने पर जोर दे रहे हों, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि कुछ समय पहले इन दोनों दलों ने पंचायत चुनावों का बहिष्कार करना पसंद किया था। कश्मीर के हालात सुधारने पर इसलिए भी जोर दिया जाना चाहिए, क्योंकि राज्य में जल्द ही अमरनाथ यात्रा का आयोजन भी होने वाला है। अमित शाह के रुख-रवैये से यह स्पष्ट है कि विश्वास बहाली के नाम पर वह ऐसा कुछ करने नहीं जा रहे हैं, जिससे समस्याएं पैदा करने वाले तत्वों को बल मिले।

यह अच्छा हुआ कि ऐसे तत्वों के प्रति किसी तरह की नरमी का संकेत देने के बजाय उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे सुरक्षा बलों की पीठ थपथपाई और यह निर्देश दिया कि लोग राज्य पुलिस के बलिदान को जानें-समझें, इसके लिए सार्वजनिक स्थलों का नामकरण उनके नाम पर किया जाए और साथ ही उनके सम्मान में समारोह आयोजित किए जाएं। इस तरह के कदमों की जरूरत भी है और उनका महत्व भी है। कश्मीर में अलगाववाद और आतंकवाद के धंधा बन जाने के कारण वहां एक ऐसा वर्ग तैयार हो गया है, जो कश्मीरियत को ही भूल बैठा है। नि:संदेह यह उल्लेखनीय है कि केंद्रीय गृहमंत्री के दौरे के समय घाटी में हड़ताल या बंद का आयोजन नहीं किया गया, लेकिन यह भी ठीक ही रहा कि उन्होंने मौजूदा हालात को एक शुरुआत के तौर पर ही देखा और स्पष्ट कर दिया कि यह मंजिल नहीं है।