प्रेरणा कुमारी

आइए हम आपको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता और उदारवाद से सराबोर भारत के ऐसे स्वर्ण युग में ले चलें, जब मोदी-शाह सरकार चलाना तो छोड़िए किसी सरकारी दफ्तर के चौकीदार भी नहीं थे। कथित सांप्रदायिक पार्टी’ भाजपा सत्ता के किसी समीकरण में भी कहीं नहीं थी। भाजपा का सारा हिंदुत्व लोकसभा की मात्र दो सीटों तक सिमटा हुआ था। उदारवाद और आधुनिकता के पोस्टर ब्यॉय राजीव गांधी कांग्रेस के इतिहास में सर्वाधिक 409 सीटें लेकर प्रधानमंत्री पद पर काबिज थे, ऐसे स्वर्णिम काल में बिट्रेन में कथित रूप से धार्मिक भावनाएं आहत करने के लिए एक किताब छपती है और कल्पना कीजिए पूरे विश्व में उस किताब पर प्रतिबंध लगाने वाला पहला देश कौन सा है। यह देश 1976 से अपने संविधान की प्रस्तावना में स्वयं को धर्मनिरपेक्ष बताने वाला भारत ही है और देश में उसी धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस की सत्ता थी जो हिंदू देवियों की नग्न तस्वीरें बनाने वाले एम.एफ. हुसैन को पदमश्री और पदमभूषण से नवाज चुकी थी।

सलमान रुश्दी की ‘सेटेनिक वर्सेस’ साहित्यक दृष्टि से अच्छी-बुरी कैसी भी हो, लेकिन 1988 में अपने प्रकाशन से लेकर आज तक यह किताब भारत के कथित कांग्रेसी-वामपंथी उदारवाद और धर्मनिरपेक्षता की कलई खोलती आ रही है। सेटनिक वर्सेस पर प्रतिबंध भारत की कथित धर्मनिरपेक्षता के उस विद्रूप चेहरे को उजागर करता है जिसमें धर्मनिरपेक्षता या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर एक ही धर्म का मखौल उड़ाया जाता है।

आइए इसके बाद आपको भारत के एक अन्य स्वर्ण काल में ले चलते हैं। 2004 में ‘फासीवादी-सांप्रदायिक-कट्टरपंथी’ भाजपा को हराने के बाद अब 2012 में फिर से कांग्रेस ही सत्ता में थी। इस दौरान राजस्थान के जयपुर में होने वाले जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में सलमान रुशदी को बुलाया जाता है। देश की धर्मनिरपेक्षता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नई ऊंचाइयां देने के लिए राजस्थान में भी कांग्रेस की ही सरकार थी।

अब कल्पना कीजिए कि रुशदी को जयपुर आने से रोकने की मांग करने में देवबंद मदरसा के मौलाना अब्दुल कासिम नोमानी के साथ कौन खड़ा था। यह राजस्थान कांग्रेस थी। राजस्थान कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष चंद्रभान सिंह ने कहा "किसी की धार्मिक भावनाएं आहत करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है"। "अगर वे रुशदी को लाए तो यहां खून की नदियां बहेंगी", और "हम रुशदी को यहां किसी भी तरीके से बात नहीं करने देंगे।

अगर उसने बात की तो यहां हिंसक प्रदर्शन होंगे", मुस्लिम पक्ष के ऐसे भड़काऊ बयानों के बीच कांग्रेस का बयान बेशक भारत की सेकुलरिज्म का असली चेहरा दिखा रहा था। कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेककर भारत में जन्मे इस लेखक को भारत में आने से तो रोका ही गया, वीडियो लिंक से लाइव संबोधन भी रोका गया। कमाल यह था कि इस पूरे प्रकरण से भारत में सहिष्णुता, अभिव्यक्ति की आजादी और सेकुलरिज्म पर कोई फर्क नहीं पड़ा क्योंकि यह सब धर्मनिरपेक्षता की माई-बाप पार्टी कांग्रेस के समर्थन से हुआ था।

ऐसा नहीं है कि धर्मनिरपेक्षता के ढ़ोंग में कांग्रेस अकेली है। हमारे देश में ऐसे तमाम पत्रकार, लेखक और लिबरल हैं जो धार्मिक मुद्दों पर आहत होने वालों का धर्म देखकर मुंह खोलते हैं। हमारी लिबरल गैंग की क्या मजाल की किसी सदस्य ने मुस्लिम कट्टरपन के विरुद्ध आवाज उठाई हो। कश्मीर में हिंदूओं के विस्थापन और हत्याओं का लंबा इतिहास रहा है लेकिन इस देश में लिबरल-सेकुलर गैंग्स को बंदूक थामे हुए आतंकवादी ही मासूम दिखे हैं।

अंततः सलमान रुशदी पर हुए हालिया हमले में क्या सिर्फ हमलावर हादी मातर अकेला जिम्मेदार है। क्या उन कथित लिबरल लोगों की कोई जिम्मेदारी नहीं है जो वर्षों तक चुनिंदा खामोशियां ओढ़कर बैठे रहे, मुस्लिम कट्टरपन प्रेरित हिंसा पर किंतु-परंतु करते रहे या हिंसा का वैचारिक समर्थन करते रहे।

भारत में कमलेश तिवारी और हाल ही में कन्हैया लाल, यूरोप में शार्ली हैब्डो, थियो वॉन गोग और सैमुअल पैटी जैसे ऐसे असंख्य उदाहरण हैं जब सभ्य समाज धर्म विशेष की आलोचना करने पर हत्याओं के विरुद्ध कथित सेकुलर पार्टियों और लिबरल लोगों से सुस्पष्ट निंदा की उम्मीद रख रहा था लेकिन ऐसी पार्टियां और लिबरल या तो खामोश रहे या कमोबेश इन हत्याओं के समर्थन में ही खड़े दिखाई दिए हैं।

(लेखिका डीआरडीओ में कार्यरत रह चुकी हैं एवं वर्तमान में स्वतंत्र लेखन एवं अनुवाद में सक्रिय हैं।)

Posted By: Navodit Saktawat

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