भारत और चीन के बीच उपजे तनाव को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति के इस कथन का ठीक-ठीक मतलब निकालना कठिन है कि दोनों देशों की सीमा पर हालात खराब हैं और वह समाधान निकालने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि पिछली बार की तरह उन्होंने मध्यस्थता की बात नहीं की, लेकिन यह समझना कठिन है कि वह दोनों देशों के बीच सुलह कराने के लिए क्या करने वाले हैं? चूंकि चीन अतिक्रमणकारी है, इसलिए यदि अमेरिकी राष्ट्रपति भारत के साथ खड़े दिखना चाहते हैं तो वह चीनी नेतृत्व पर इसके लिए दबाव बनाएं कि वह सैन्य गुंडागर्दी दिखाने से बाज आए। उनके तेवर तो ठीक वैसे ही होने चाहिए जैसे अमेरिकी विदेश मंत्री ने यह कहकर दिखाए कि चीनी सत्ता बदमाशी करने में लगी हुई है। यह ठीक है कि अमेरिका सहित कई प्रमुख देशों ने लद्दाख में भारतीय सैनिकों के बलिदान पर अपनी संवेदना व्यक्त की, लेकिन चीन की जैसी कठोर निंदा होनी चाहिए, वह अभी देखने को नहीं मिल रही है। भारत को इसके लिए कूटनीतिक स्तर पर कोशिश करनी चाहिए कि विश्व के प्रमुख राष्ट्र और खासकर सुरक्षा परिषद के सदस्य चीन के आक्रामक रवैये के खिलाफ एकजुट हों और उसकी भर्त्सना करें।

विश्व समुदाय को चीन को इसलिए भी कठोर निंदा का पात्र बनाना चाहिए, क्योंकि जब दुनिया उसकी धरती से निकले कोरोना वायरस से जूझ रही है तब वह हांगकांग को हड़पने, ताइवान को तंग करने और भारत को धमकाने की कोशिश कर रहा है। इसके साथ ही वह उन देशों के खिलाफ दादागीरी भी दिखा रहा है, जो यह मांग कर रहे हैं कि कोरोना वायरस के प्रसार की तह तक जाने की जरूरत है। चीन खुद को महाशक्ति साबित करने के लिए जैसी हरकतें कर रहा है, वे काफी कुछ वैसी ही हैं, जैसी हिटलर के वक्त जर्मनी की थीं। दुनिया के बड़े देशों को यह समझने की जरूरत है कि निरंकुश चीनी नेतृत्व एशिया ही नहीं, विश्व शांति के लिए खतरा बन रहा है। वह अपनी हद में रहे, इसके लिए उस पर चौतरफा दबाव बनाया जाना चाहिए। इस दबाव में भारत को भी शामिल होना होगा। यदि चीन बातचीत से मसलों को सुलझाने के लिए तैयार नहीं होता और अपने अतिक्रमणकारी रवैये का परित्याग नहीं करता तो भारत को उसके खिलाफ सैनिक, आर्थिक, कूटनीतिक स्तर पर सक्रियता दिखाने के लिए तैयार रहना चाहिए। यह सक्रियता ऐसी होनी चाहिए कि दुनिया को यह साफ संदेश जाए कि भारत चीन से बातचीत के लिए तो तैयार है, लेकिन उसकी दादागीरी को सहन करने के लिए हर्गिज नहीं तैयार। तानाशाह चीन की घेराबंदी वक्त की मांग भी है और जरूरत भी।

Posted By: Ravindra Soni

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