नई दिल्ली में रूस-भारत-चीन (रिक) समूह के विदेश मंत्रियों की बैठक ऐसे समय में हुई, जब भारतीय विदेश नीति में बदलाव की चर्चाएं मीडिया में छायी रही हैं। एक महीना पहले भारत- ऑस्ट्रेलिया-जापान-अमेरिका ने अपनी पहली चतुष्कोणीय बैठक की थी। तब से उपरोक्त धारणा और भी अधिक चर्चित हुई। उस बैठक को चीन की बढ़ती ताकत के खिलाफ उन चार देशों की रणनीतिक पहल माना गया। कहा गया कि भारत अब खुलकर अमेरिकी खेमे में शामिल हो गया है। जबकि डेढ़ दशक पहले उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों के आपसी समन्वय और सहयोग के मंच के रूप में 'रिक अस्तित्व में आया था। बाद में ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने से ये पहल 'ब्रिक्स के रूप में विकसित हुई, मगर इन तीन देशों ने अलग से भी वार्ता और विमर्श के लिए इस मंच को कायम रखा।


बेशक, तब से परिस्थितियां काफी बदली हैं। तब वो अल्पकालिक दौर था, जब भारत-चीन के संबंधों में सुधार होता दिखता था। इस हद तक कि दोनों देशों में सीमा विवाद को हल करने के राजनीतिक सिद्धांतों पर सहमति बनी थी। लेकिन गुजरे कुछ सालों से तो भारत और चीन के संबंधों में सहयोग से ज्यादा तनाव की चर्चा ही रही है। इसके अलावा यह भी कहा गया है कि भारत-रूस संबंधों में पहले जैसी गर्मजोशी अब नहीं रही। जबकि रूस और चीन के आपसी संबंध लगातार घनिष्ठ हुए हैं। इस पृष्ठभूमि में पिछले अप्रैल में जब 'रिक विदेश मंत्रियों की तय बैठक टल गई, तो इस मंच के भविष्य को लेकर सवाल गहराए। लेकिन नई दिल्ली में सुषमा स्वराज, सर्गेई लावरोव और वांग यी की सोमवार को हुई बैठक से यह स्पष्ट संदेश मिला कि एक बहुध्रुवीय दुनिया में हर मंच की अपनी उपयोगिता है। उसमें किन्हीं देशों के बीच बनता सहयोग अनिवार्य रूप से किसी और से संबंध की कीमत पर नहीं होता।


भारत के लिए यह अतिरिक्त संतोष की बात है कि नई दिल्ली बैठक में रूस और चीन ने आतंकवाद के सभी रूपों की निंदा करने में भारत से अपना स्वर जोड़ा तथा आतंकवाद को रोकने और उसका मुकाबला करने के अपने संकल्प को दोहराया। साझा विज्ञप्ति में यह भी कहा गया कि 'आतंकवाद को अंजाम देने, संगठित करने, भड़काने या समर्थन देने वालोंको जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। उनसे इंसाफ किया जाना चाहिए। ऐसी गतिविधियों में कौन शामिल है और किस देश का सबसे ज्यादा समर्थन ऐसे तत्वों को हासिल है, ये बात अब जगजाहिर है। इसके बावजूद चीन का इस शब्दावली पर राजी होना कम से कम सैद्धांतिक रूप से पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय रूप से अलग-थलग पड़ने का सबूत है। भारत में यह जरूर पूछा जाएगा कि क्या अब सचमुच चीन इस घोषणा के अनुरूप आचरण करेगा? इस बारे में यकीन करने के पर्याप्त आधार नहीं हैं। फिर भी चीन का भारतीय चिंताओं से सहमत होना और अंतत: 'रिक विदेश मंत्रियों की बैठक का होना यह बताता है कि भारतीय चिंताओं को नजरअंदाज करना उसके लिए मुमकिन नहीं है। यह भारतीय विदेश नीति की अहम कामयाबी है।

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