केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह के इस दावे को खारिज नहीं किया जा सकता कि बीते चार सालों में मोदी सरकार ने किसानों की दशा सुधारने के लिए बहुत कुछ किया है, लेकिन यह कहना कठिन है कि उनकी तरह औसत किसान भी उन सब योजनाओं को सफल होते हुए देख रहे हैं, जो खेती को लाभदायक बनाने के लिए लागू की गई हैं। नि:संदेह बात तब बनेगी जब किसानों को यह भरोसा हो जाए कि अगले कुछ वर्षों में उनकी आय वास्तव में दोगुनी होने जा रही है। इससे इनकार नहीं कि मोदी सरकार बार-बार यह कह रही है कि वह वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने के लिए संकल्पबद्ध है और इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए एक के बाद एक कदम भी उठाए जा रहे हैं, लेकिन किसानों की हालत में उतनी तेजी से सुधार होता हुआ नहीं दिखता जिससे यह माना जाने लगे कि अगले चार सालों में खेती मुनाफे का सौदा बन जाएगी।

चूंकि अगले आम चुनाव में एक साल की ही देर है, इसलिए कृषि मंत्रालय को इस पर ध्यान देना होगा कि किसानों की बेचैनी कैसे समाप्त हो। इसके लिए सबसे जरूरी तो यह है कि किसानों को उनकी कृषि उपज का लागत से इतना अधिक मूल्य मिले कि खेती घाटे का सौदा न रहे और किसान अपना व अपने परिवार का जीवन-यापन अच्छी तरह कर सकें।


यह अच्छी बात है कि कृषि मंत्री ने यह रेखांकित किया कि सरकार दो दर्जन से अधिक फसलों का समर्थन मूल्य उनकी लागत का डेढ़ गुना देने की तैयारी कर रही है, लेकिन अभी तक इस सवाल का जवाब सामने नहीं आ सका है कि आखिर लागत मूल्य का निर्धारण कैसे होगा? लागत मूल्य के निर्धारण की प्रक्रिया जो भी हो, वह किसानों के हितों की पूर्ति करने और उन्हें संतुष्ट करने वाली होनी चाहिए। इस मामले में कृषि मंत्रालय इसकी अनदेखी नहीं कर सकता कि केवल उचित समर्थन मूल्य की घोषणा ही पर्याप्त नहीं है। इसके साथ यह भी आवश्यक है कि कृषि उपज घोषित समर्थन मूल्य के आधार पर ही खरीदी जाए। कृषि मंत्री और उनका मंत्रालय इससे अनभिज्ञ नहीं हो सकता कि कई बार संतोषजनक समर्थन मूल्य की घोषणा तो कर दी जाती है, लेकिन उस मूल्य पर कृषि उपज की बिक्री इसलिए नहीं हो पाती, क्योंकि सरकारी एजेंसियां पर्याप्त अनाज खरीदने में सक्षम नहीं होतीं। इस समस्या का समाधान प्राथमिकता के आधार निकाला जाना चाहिए। इसी के साथ कोई ऐसी व्यवस्था भी की जानी चाहिए, ताकि किसान इससे परिचित रहे कि कौन-सी फसल उगाना लाभदायक है? कई बार किसान यह सोचकर कोई फसल उगाते हैं कि उसकी उपज के बेहतर दाम मिलेंगे, लेकिन व्यापक पैदावार के कारण्ा उसके दाम गिर जाते हैं और इस तरह उन्हें भरपूर पैदावार के दुष्परिण्ााम भोगने पड़ते हैं। यह किसी से छिपा नहीं कि किसान न केवल इससे चिंतित रहता है कि कहीं उपज कमजोर तो नहीं रह जाएगी, बल्कि इससे भी कि कहीं पैदावार इतनी ज्यादा तो नहीं हो जाएगी कि उसके दाम गिर जाएं। बेहतर होगा कि इस पर गौर किया जाए कि क्या कुछ फसलों की खेती जरूरत से ज्यादा रकबे में कर दी जाती है?