सोने का भाव पांच साल में सबसे निचले स्तर तक गिर गया है। भारतीय बाजारों में प्रति दस ग्राम सोने की कीमत 25,000 रुपए से नीचे जा चुकी है। दुनियाभर के निवेशकों में रुझान सोना बेचकर (अमेरिकी) डॉलर खरीदने का है। नतीजतन, सोना सस्ता हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमत का सीधा असर भारत के घरेलू बाजार पर होता है।

वैसे डॉलर की तुलना में रुपए के भाव से भी सोने की कीमत प्रभावित होती है। भारत हर साल 900-1000 टन सोने का आयात करता है। इसका भुगतान डॉलर में होता है। भारत में सोने का भाव उच्चतम स्तर पर 28 अगस्त 2013 को पहुंचा था। उस रोज सोना प्रति दस ग्राम 33,265 रुपए का हो गया। उस दिन एक डॉलर का भाव 68.85 रुपए पहुंच गया था। तब रुपए के कमजोर होने से गहराती आशंकाओं के बीच लोगों में सोना खरीदने की होड़ लगी थी।

दरअसल, यह रुझान दुनियाभर में है कि लोग खासकर आर्थिक संकट के दिनों में सोने में निवेश करना सुरक्षित विकल्प समझते हैं। यह बड़ा कारण है, जिससे 1980 के बाद से सोने का भाव लगातार चढ़ता गया। 2008 में अमेरिका में आई मंदी के बाद इसकी कीमत तेजी से चढ़ी। सितंबर 2011 में यह सर्वोच्च स्तर पर पहुंची, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रति औंस इसका भाव 1,895 डॉलर हो गया। आर्थिक मंदी से निकलने की कोशिश में गुजरे वर्षों में अमेरिका के केंद्रीय बैंक (फेडरल रिजर्व) ने ब्याज दर को लगभग शून्य प्रतिशत पर बनाए रखा। अत: मुनाफे के लिहाज से डॉलर में निवेश वाजिब विकल्प नहीं माना जाता था।

मगर अब सूरत बदली है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था ने स्वस्थ वृद्धि दर हासिल कर ली है। अनुमान है कि जल्द ही वहां ब्याज दरें बढ़ेंगी। तो निवेशकों ने डॉलरों की खरीद तेज कर दी है। इसके लिए वे सोना बेच रहे हैं, जिससे सोने का भाव गिर रहा है। भारत में बुधवार को यह 24,820 रुपए हो गया। इस ट्रेंड में निकट भविष्य में बदलाव की संभावना नहीं है, क्योंकि यूरो, येन इत्यादि प्रमुख मुद्राओं की तुलना में डॉलर के मजबूत होने की ठोस स्थितियां हैं। फिर अमेरिका में ब्याज दरें देरसबेर बढ़ेंगी, यह मानकर चला जा रहा है।

सोने के मुरीद उपभोक्ताओं के लिए यह अच्छी खबर है। मगर भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए इसमें कुछ चिंताएं छिपी हैं। 2011 से तुलना करें तो भारतीय रिजर्व बैंक के भंडार में मौजूद सोने का भाव 44 फीसदी घट चुका है। रिजर्व बैंक के पास 557.75 मीट्रिक टन सोना है। सितंबर 2011 में इसका मूल्य 37.8 अरब डॉलर था। 20 जुलाई 2015 को यह 21.1 अरब डॉलर रह गया।

हालांकि इस परिवर्तन का अर्थव्यवस्था पर तुरंत कोई असर नहीं होगा। फर्क तब पड़ता है, जब सोना बेचने की नौबत आए। फिलहाल भारत के पास 354 अरब डॉलर का समृद्ध विदेशी मुद्रा भंडार है। मगर स्वर्ण भंडार सुरक्षा का अहसास कराता है। इसके भाव में गिरावट का मनोवैज्ञानिक असर लाजिमी है।