रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास का यह कथन मंदी की आहट पर मुहर लगाने वाला है कि अर्थव्यवस्था शिथिल पड़ रही है। हालांकि अर्थव्यवस्था की आंतरिक और बाहरी चुनौतियों का जिक्र करते हुए उन्होंने यह भी कहा कि लोगों को निराशा के सुर में सुर मिलाने की जगह आगे के अवसरों को देखना चाहिए, लेकिन ऐसा तो तभी होगा जब उन्हें अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर कुछ बेहतर होते हुए दिखेगा। मुश्किल यह है कि इन दिनों ऐसी ही खबरें अधिक आ रही हैं जो यह इंगित करती हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था मंदी के दौर में प्रवेश कर रही है। आर्थिक विकास के आंकड़े, शेयर बाजार का हाल, घटता निवेश एवं औद्योगिक उत्पादन में गिरावट के साथ कारों और अन्य वाहनों की कम होती बिक्री यदि कुछ कह रही है तो यही कि मंदी दबे पांव आगे बढ़ रही है। इससे आम लोगों का आशंकित होना स्वाभाविक है। यह सही है कि मोदी सरकार उद्योग जगत को कुछ रियायत-राहत देने पर विचार कर रही है, लेकिन केवल इतना ही पर्याप्त नहीं होगा। उसे यह भी देखना होगा कि औद्योगिक-व्यापारिक गतिविधियां तेजी पकड़ें। नि:संदेह ऐसा तब होगा, जब विभिन्न् वस्तुओं की मांग बढ़ेगी। स्पष्ट है कि सरकार को कुछ ऐसे भी उपाय करने होंगे, जिससे आम आदमी को राहत मिले और वह इस मानसिकता से मुक्त हो कि आने वाले कठिन समय को देखते हुए पैसे बचाकर रखने की आवश्यकता है।

सरकार के नीति-नियंताओं को मंदी को गहराने से रोकने के लिए सक्रिय होने के साथ ही यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी कैसे बढ़े। मेक इन इंडिया के बावजूद यह हिस्सेदारी अभी 15 प्रतिशत के आसपास ही है। इसी तरह निर्यात के मोर्चे को भी मजबूत करने की जरूरत है। नि:संदेह इसकी भी सख्त जरूरत है कि आवास एवं सड़क निर्माण परियोजनाओं के साथ ग्रामीण ढांचे के विकास को प्राथमिकता मिले। इससे रोजगार के अवसरों में भी वृद्धि होगी और अर्थव्यवस्था का पहिया गति पकड़ते हुए दिखेगा। सरकार को न केवल निवेश में कमी के कारणों की तह तक जाना होगा, बल्कि उनका निवारण भी करना होगा। निजी निवेश में कमी आते चले जाना शुभ संकेत नहीं। रिजर्व बैंक के गवर्नर ने यह सही कहा कि सकारात्मक रवैये की बड़ी भूमिका होती है। बेहतर होगा कि सरकार भी इस भूमिका का महत्व समझे। यह इसलिए आवश्यक है, क्योंकि आम बजट के जरिये उठाए गए कई कदमों ने निवेशकों को निराश करने का काम किया है। एक तथ्य यह भी है कि बैंक मुसीबत से बाहर निकलते, उसके पहले ही आईएलएंडएफएस के संकटग्रस्त होने से हालात और प्रतिकूल हो गए।