अगले सप्ताह से शुरू हो रहे संसद के मानसूत्र सत्र की ओर देश की निगाहें केवल इसलिए नहीं रहेंगी, क्योंकि कोरोना संकट खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है, बल्कि इसलिए भी रहेंगी कि लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर युद्ध के बादल मंडराते दिख रहे हैं। इसके अलावा अन्य अनेक समस्याओं के साथ देश की अर्थव्यवस्था भी इस वक्त गहरे संकट में है। इसी कारण वर्तमान परिस्थितियों को सामान्य नहीं कहा जा सकता।

भविष्य को लेकर बेचैनी और असमंजस के इस माहौल में देशवासियों की दिलचस्पी केवल इसमें ही नहीं होगी कि देश के समक्ष उपस्थित समस्याओं पर विपक्ष की ओर से उठने वाले सवालों पर सत्तापक्ष की ओर से कैसे और क्या जवाब दिए जाते हैं, बल्कि इसमें भी होगी कि दोनों पक्ष मिलकर देश को कोई सही राह दिखाने का काम कर पाते हैं या नहीं? वास्तव में यह वह समय है जब दलगत हितों से ऊपर उठकर एक आदर्श स्थापित किया जाए। नि:संदेह सभी ज्वलंत मसलों पर चर्चा होनी ही चाहिए, लेकिन उसका उद्देश्य समस्याओं का समाधान खोजना होना चाहिए, न कि एक-दूसरे को कठघरे में खड़ा कर संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों का संधान करना। दलगत राजनीतिक हितों के बजाय देश हित को प्राथमिकता मिले, यह सत्तापक्ष को भी सुनिश्चित करना चाहिए और विपक्ष को भी।

यह सही है कि संसद चलाना सत्तापक्ष की जिम्मेदारी है, लेकिन इस जिम्मेदारी का निर्वाह तभी हो सकता है जब विपक्ष सहयोग भाव प्रदर्शित करेगा। कोरोना संकट के कारण प्रश्नकाल स्थगित करने की घोषणा होते ही विपक्षी दलों ने जिस तरह आसमान सिर पर उठा लिया, वह कोई शुभ संकेत नहीं। हैरानी की बात यह है कि प्रश्नकाल स्थगित करने का विरोध उन राजनीतिक दलों की ओर से भी किया गया, जिन्होंने अपने शासन वाले राज्यों में जब विधानसभा सत्र बुलाए तो प्रश्नकाल न कराना बेहतर समझा। यदि कोरोना संकट के कारण विधानसभाओं में प्रश्नकाल न होना स्वीकार्य है, तो फिर संसद में अस्वीकार्य क्यों और वह भी तब लिखित सवालों के जवाब देने की सुविधा उपलब्ध रहने वाली है?

अपेक्षित केवल यह नहीं है कि संसद के इस सत्र में जो विधेयक पेश और पारित किए जाने हैं, उन पर गंभीर चर्चा हो, बल्कि महज विरोध के लिए विरोध की राजनीति का परित्याग किया जाए। कम से कम चीन की चुनौती पर तो संसद को एकजुट दिखना ही चाहिए। जहां विपक्ष को सरकार की नीतियों और उसकी ओर से पेश किए जाने वाले विधेयकों का हर हाल में विरोध करने की प्रवृत्ति का प्रदर्शन करने के बजाय सकारात्मक एवं उपयोगी सुझावों के साथ सामने आना चाहिए, वहीं सत्तापक्ष को हर ऐसे सुझाव पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के लिए तैयार दिखना चाहिए।

Posted By: Ravindra Soni

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