भारत अब ईरान के सहयोग से चीन और पाकिस्तान को जोरदार चुनौती की स्थिति में है। चाबहार बंदरगाह चालू हो गया है। इससे मध्य एशियाई देशों से कारोबार के लिए भारत की पाकिस्तान पर निर्भरता समाप्त होगी। साथ ही बिना पाकिस्तानी रास्तों का इस्तेमाल किए अफगानिस्तान तक पहुंचना संभव हो जाएगा। पाकिस्तानी तट पर चीन ग्वादर बंदरगाह का निर्माण कर रहा है, लेकिन अब उसे इसकी आर्थिक उपयोगिता पर नए सिरे से विचार करना पड़ सकता है। ओमान की खाड़ी से लगे ईरानी तट पर बने चाबहार बंदरगाह तक समुद्री मार्ग के जरिए मुंबई से सीधे पहुंचा जा सकता है। यहां से अफगानिस्तान और मध्य एशियाई देशों को निर्यात और वहां से आयात का जमीनी रास्ता मिलेगा। इसीलिए भारत ने इस बंदरगाह के निर्माण में 50 करोड़ डॉलर का निवेश किया। यानी चाबहार बंदरगाह में भारत का आंशिक स्वामित्व है। इसके अलावा भारत इस बंदरगाह तक पहुंचने के मार्गों के निर्माण से भी जुड़ा है। मसलन, ईरान में एक अरब 60 लाख डॉलर के निवेश से बन रहे जहेदान-चाबहार रेल मार्ग में उसकी भागीदारी है। भारत के लिए इस बंदरगाह के महत्व को देखते हुए ही इसके उद्घाटन से ठीक पहले रूस यात्रा से लौटते हुए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज कुछ समय ईरान में रुकीं।


ध्यानार्थ है कि अफगानिस्तान में विभिन्न् प्रकार के निर्माण एवं सहायता कार्यों से भारत जुड़ा हुआ है। पाकिस्तान की हरकतों के कारण भारत के लिए वहां तक पहुंचने में हमेशा ही कठिनाइयां आती रही हैं। पाकिस्तान नहीं चाहता कि अफगानिस्तान में भारत की कोई भूमिका हो। अतीत में उसने इल्जाम लगाए हैं कि अफगानिस्तान में अपनी उपस्थिति बनाकर भारत पाकिस्तान में अस्थिरता फैलाने में लगा रहा है। इस पृष्ठभूमि के मद्देनजर बिना पाकिस्तानी भू-मार्ग का उपयोग किए अफगानिस्तान तक पहुंचने की सुविधा प्राप्त होना भारत के लिए एक रणनीतिक उपलब्धि है। इससे अफगानिस्तान भी कराची बंदरगाह के जरिए अपना सारा व्यापार करने की मजबूरी से मुक्त हो जाएगा। इससे वह पाकिस्तान के बरक्स अधिक स्वतंत्र नीति अपना सकेगा, जो अक्सर तालिबान या हक्कानी गुट जैसे आतंकवादी समूहों के जरिए वहां हस्तक्षेप करता रहा है। चाबहार बंदरगाह को एक लाभ यह भी मिल सकता है कि वह ग्वादर बंदरगाह से पहले तैयार हो गया। वहां सिर्फ 80 किलोमीटर की दूरी पर चीन वह बंदरगाह मध्य एशिया से कारोबार को ध्यान में रखकर ही बना रहा है। यह 'वन बेल्ट वन रोड (ओबोर) परियोजना के जरिए इस क्षेत्र के कारोबार पर एकाधिकार कायम करने की उसकी मंशा का ही एक हिस्सा है। अब चाबहार वैकल्पिक मार्ग के रूप में विभिन्न् देशों को उपलब्ध होगा। इससे ग्वादर को प्रतिस्पर्धा का सामना करना होगा। स्पष्टत: चाबहार परियोजना का हिस्सा बनकर भारत ने बुद्धिमानी का परिचय दिया। ईरान पर लगे पश्चिमी प्रतिबंधों से इसे आगे बढ़ाने में देर जरूर हुई, मगर पाबंदियां हटते ही काम तेजी से हुआ। रविवार को ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी के हाथों उद्घाटन के साथ रणनीतिक महत्व का ये व्यापारिक मुकाम चालू हो गया। यह भारत के लिए बड़ी खुशखबरी है।

Posted By:

नईदुनिया ई-पेपर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे

नईदुनिया ई-पेपर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे

डाउनलोड करें नईदुनिया ऐप | पाएं मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और देश-दुनिया की सभी खबरों के साथ नईदुनिया ई-पेपर,राशिफल और कई फायदेमंद सर्विसेस

डाउनलोड करें नईदुनिया ऐप | पाएं मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और देश-दुनिया की सभी खबरों के साथ नईदुनिया ई-पेपर,राशिफल और कई फायदेमंद सर्विसेस

जीतेगा भारत हारेगा कोरोना
जीतेगा भारत हारेगा कोरोना