कल (25 दिसंबर) से इंदौर में एक नई शुरुआत हो रही है- यदि सार्वजनिक स्थान पर थूका तो जुर्माना वसूला जाएगा। स्वच्छता को स्वभाव बनाने की ओर अग्रसर एक शहर का यह नया संकल्प एक बार फिर आदमी की आदत पर अंगुली उठा रहा है। पूछा जाना चाहिए कि एक ही शहर में बस स्टैंड और एयरपोर्ट पर एक ही आदमी दो अलग रूप में क्यों दिखाई देता है। दरअसल, गुटका और पान के कारण उत्तर-मध्य भारत में थूकने की प्रवृत्ति ज्यादा है।

राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार देश के 11 राज्यों में तंबाकू का उपयोग अधिक होता है। सबसे ज्यादा मिजोरम, यहां 80 प्रतिशत लोगों को तंबाकू की लत है। जबकि, मध्य प्रदेश में 60 व छत्तीसगढ़ में 55 फीसदी इसके शिकार हैं। एक चिंता और है। सार्वजनिक स्थानों पर थूकने की प्रवृत्ति बुराई की श्रेणी में आती है, यह सभी जानते, समझते और मानते भी हैं, लेकिन मसला जैसे ही सुधार के संकल्प तक आता है, लोग समस्याएं बुनने-बताने लग जाते हैं। संदर्भ बताता है कि बीते एक दशक में इस समस्या की ओर ध्यान गया तो इसका विकराल रूप सामने आया।

बृहन्मुंबई महानगर पालिका ने क्लीन अप मार्शल रखकर कार्रवाई शुरू की तो 2016-17 में 93 हजार केस बने और लगभग नौ करोड़ रुपए का जुर्माना वसूला गया। एक शहर का ये आंकड़ा है तो देश की हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है। 2016 में ही पहली बार यह मसला उस वक्त व्यापक स्तर पर चर्चा में आया जब राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान तृणमूल कांग्रेस के सांसद नदीमुल हक ने कहा- भारत एक थूकने वाला देश (स्पिटिंग कंट्री) है। हम जब बोर होते हैं- तो थूकते हैं। थके या गुस्से में होते हैं- तो थूकते हैं।

कई बार, कुछ नहीं कर रहे होते हैं- तब भी थूकते रहते हैं। सीपीएम के सांसद सीपी नारायणन सहित कई अन्य सांसदों ने भी समर्थन में सवाल उठाया और कहा - सार्वजनिक जगह पर थूकने को खुले में शौच की तरह देखा जाना चाहिए। थूकने पर जुर्माने की इंदौरी पहल का स्वागत करते हुए नदीमुल हक कहते हैं - हम सिंगापुर जाते हैं तो वहां जुर्माने के डर से पान-गुटका खाना बंद कर देते हैं। फिर देश में ऐसा क्यों करते हैं। 2016 में, कोलकाता में, डॉक्टर्स ने एंटी स्पिटिंग डे नाम से कार्यक्रम आयोजित किया। मैं उसमें भाग लेने गया, सभी की बातें सुनकर लगा कि अब सरकार को सख्ती से कदम उठाना ही चाहिए। तब मैंने इसे स्वच्छ भारत अभियान का हिस्सा बनाए जाने की मांग की।

स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने गंभीरता समझी और सदन में जवाब दिया- सरकार कानून बनाने पर विचार करेगी। यदि इंदौर खुद पहल कर रहा है तो यह स्वागत योग्य है। अब संकट का एक और पड़ाव। ब्रिटिश साम्राज्य की धरोहर और दुनिया के सबसे मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर में से एक माने जाने वाले कोलकाता के हावड़ा ब्रिज को इंसान के थूक से जंग लगने लगा था।

हजार टन स्टील से बने इस कैंटिलीवर पुल से रोजाना एक लाख गाड़ियां और 5 लाख से ज्यादा लोग गुजरते हैं। 2005 में 1000 टन वजनी कार्गो जहाज से टकराने के बाद भी जो ब्रिज मजबूती से खड़ा रहा उसे पान के पीक- थूक ने जंग लगा दी। कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट के तत्कालीन चीफ इंजीनियर ने 2010 में इसका खुलासा किया कि ब्रिज के कुछ आधार की मोटाई तो पिछले तीन साल में आधी रह गई है।

सेंट्रल फॉरेंसिक साइंस लैब कोलकाता के विशेषज्ञों की रिपोर्ट में बताया गया है कि थूक के साथ मिलकर पान में मौजूद चीजें स्टील पर एसिड सरीखा असर छोड़ती हैं। पोर्ट के वर्तमान चीफ इंजीनियर एके जैन का मानना है- समस्या से लड़ने के लिए जागरूकता जरूरी है। हमने अभियान चलाया, जगह-जगह बोर्ड लगाए। अब स्थिति में काफी सुधार है। ऐसे ही सुधार के लिए संघर्ष करती एक और मिसाल।

दिल्ली की एक संस्था है कनफेडेरेशन ऑफ एजुकेशन एक्सेलेंस (सीईई)। यह भारतीयों में सिविक सेंस विकसित करने के लिए काम करती है। संस्था अध्यक्ष श्रुति अरोरा कहती हैं- सेना के अफसरों को पदोन्नाति से पहले प्रशिक्षण देने वाली 140 साल पुरानी संस्था यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया के साथ मिलकर हम स्कूलों के लिए कोर्स तैयार कर रहे हैं। जैसे 12वीं के बाद सेना में प्रवेश पाने वाले युवा सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त कर जवान बन जाते हैं। उनका नजरिया बदलता है तो देश सर्वोपरि हो जाता है। यानी, सही प्रशिक्षण पाकर सामान्य युवा परिवर्तन की परिभाषा बन जाते हैं। जब वे सीख-समझकर बदलाव ला सकते हैं, तो मध्य प्रदेश के गांव-शहर क्यों नहीं?

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