लोकसभा में गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय की ओर से दी गई यह जानकारी संतोष प्रदान करने वाली है कि पाकिस्तान से होने वाली घुसपैठ में कमी आई है। उनके अनुसार बीते छह माह में सीमा पार से आतंकियों की घुसपैठ में कमी आने के साथ ही जम्मू-कश्मीर के हालात भी सुधरते दिख रहे हैं। घुसपैठ के साथ उसके प्रयासों में भी कमी दर्ज होना यह बताता है कि आतंकियों का दुस्साहस पस्त पड़ा है। नि:संदेह इसकी एक बड़ी वजह बालाकोट में भारतीय वायुसेना की ओर से की गई एयर स्ट्राइक रही। इस एयर स्ट्राइक ने पाकिस्तान के होश ठिकाने लगाने का काम किया, इसका प्रमाण इससे भी मिलता है कि नियंत्रण रेखा पर संघर्ष विराम उल्लंघन की घटनाओं में कमी देखने को मिल रही है। यह भी उल्लेखनीय है कि कश्मीरियों के बंदूक उठाने यानी आतंक के रास्ते पर जाने का सिलसिला भी कुछ धीमा पड़ा है। इस सबके बावजूद चैन से नहीं बैठा जा सकता और न ही यह माना जा सकता है कि पाकिस्तान नए सिरे से कश्मीर को अशांत करने की कोशिश नहीं करेगा। चूंकि आसार इसी के हैं कि वह आसानी से अपनी हरकतों से बाज नहीं आएगा इसलिए उस पर दबाव बनाए रखा जाना चाहिए। इसके लिए न केवल सीमा पर सतर्कता दिखाने, बल्कि पाकिस्तान को यह संदेश देने की भी जरूरत है कि यदि उसने कश्मीर में हस्तक्षेप किया तो बालाकोट दोहराया भी जा सकता है। वास्तव में पाकिस्तान पर तब तक भरोसा नहीं किया जा सकता, जब तक वह भारत के लिए खतरा बने आतंकी संगठनों को पालने-पोसने की अपनी नीति का परित्याग नहीं करता।

यह अच्छा है कि भारत ने इस बात को स्पष्ट करने में देर नहीं की कि वह आतंकी सरगना हाफिज सईद के खिलाफ की गई हालिया कार्रवाई को दिखावटी ही मानता है। भारत इसकी अनदेखी नहीं कर सकता कि पाकिस्तान मुंबई और साथ ही पठानकोट में हमले के गुनहगारों के खिलाफ कोई ठोस कदम उठाने से इनकार ही कर रहा है। भारत को इस पर भी निगाह रखनी होगी कि अमेरिका और अफगान तालिबान के बीच जारी बातचीत किस नतीजे की ओर बढ़ रही है। अगर दोनों में कोई समझौता होता है, तो अफगानिस्तान में पाकिस्तान का दखल बढ़ सकता है। यह भारत के हित में नहीं होगा। अब जब यह स्पष्ट है कि अमेरिका एक सीमा तक ही भारत के हितों की चिंता कर रहा है, तब फिर यह आवश्यक है कि भारतीय नेतृत्व अपने बलबूते पाकिस्तान पर अंकुश लगाने के उपाय करे। इसी तरह कश्मीर के हालात में सुधार दिखने के बावजूद यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि यहां सक्रिय पाकिस्तानपरस्त तत्व पस्त पड़ें। यह ठीक नहीं कि ऐसे तत्व खुलेआम अपने को पाकिस्तानी बताते हुए आतंकियों का गुणगान कर रहे हैं। यह भी चिंताजनक है कि मुख्यधारा के नेता अलगाववादियों जैसी भाषा बोल रहे हैं। चूंकि कश्मीर घाटी के हालात में उतार-चढ़ाव कोई नई बात नहीं, इसलिए वहां सीमा पर और सीमा के अंदर की गतिविधियों को लेकर सतर्क रहने की जरूरत है। यह जरूरत इसलिए और भी अधिक है, क्योंकि वहां के हालात आसानी से सामान्य नहीं होने वाले।

Posted By: Ravindra Soni