पुणे में एक सूचना तकनीक फर्म में मैनेजर मोहसिन मोहम्मद सादिक शेख का सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर बनाए गए आपत्तिजनक पेजों से कोई लेना-देना नहीं था। वे सिर्फ अपनी धार्मिक पहचान के कारण उन पेजों से भड़के हिंदू राष्ट्र सेना नामक संगठन के शिकार बन गए। उनकी हत्या देश में बढ़ती असहिष्णुता की मिसाल है, जिससे हर संवेदनशील व्यक्ति का मन क्षोभ से भर जाना चाहिए।

दुर्भाग्यपूर्ण है कि कानून लागू करने वाली एजेंसियां जहां निर्दोष लोगों को सुरक्षा देने में विफल हैं, वहीं वे सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अवरुद्ध करने में सहायक बन रही हैं। कानूनी प्रावधानों का इस्तेमाल इस तरह हो रहा है, जिससे इंटरनेट यूजर्स खुद को भयाक्रांत महसूस करने लगे हैं।

विश्वव्यापी स्वरूप वाले इंटरनेट माध्यम पर कोई सामग्री दुनिया में कहीं से भी पोस्ट की जा सकती है, जो मुमकिन है कि आपत्तिजनक या भड़काऊ भी हो। उसे रोकने का क्या उपाय है, यह सुरक्षा एजेंसियां नहीं ढूंढ़ पाई हैं। महाराष्ट्र में हालिया विवाद छत्रपति शिवाजी और बाल ठाकरे के खिलाफ फेसबुक पर 'आपत्तिजनक' पेज बनाए जाने से भड़का।

पुलिस ने इन पेजों को तो ब्लॉक कर दिया, लेकिन ये पेज किसने और कहां से बनाए, यह मालूम नहीं कर सकी। यानी इन पेजों के जरिए हुए अपराध के दोषियों की पहचान करने में पुलिस विफल है। इन पेजों को लेकर महाराष्ट्र के कई शहरों में प्रदर्शन और तोड़फोड़ हुई। तब उपरोक्त पेजों को निर्मित करने वाले 'अज्ञात' लोगों के खिलाफ पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 295(ए) (जान-बूझकर और दुर्भावना के साथ किसी वर्ग की धार्मिक आस्थाओं को आहत करना) के तहत प्राथमिकी दर्ज की।

इस बीच यह खबर भी आई कि पुलिस ऐसे लोगों के खिलाफ आईटी एक्ट की धारा 66(ए) के तहत कार्रवाई करने की सोच रही है, जिन्होंने आपत्तिजनक फेसबुक पेजों को लाइक किया। जाहिर है, ऐसे कदम भड़के जनसमूहों को संतुष्ट करने के लिए उठाए गए।

इससे पहले गोवा में देवू चोडानकर नामक व्यक्ति के खिलाफ भी फेसबुक पर एक टिप्पणी करने के आरोप में कार्रवाईकी गई। पुलिस का यह रुख समझ से परे है। आईटी एक्ट की धारा 66(ए) के तहत आधुनिक संचार तकनीक के जरिये अपमानजनक संदेश भेजना जुर्म है, जिसके साबित होने पर तीन साल तक कैद हो सकती है।

कानून की व्याख्या करते हुए सोशल मीडिया पर ऐसे संदेशों को लाइक करने को भी इसके दायरे में लाया जा सकता है। मगर क्या यह औचित्यपूर्ण है? क्या यह नागरिकों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं है?

हैरतअंगेज यह है कि भावनाएं आहत होने की बात कहकर कानून को अपने हाथ में ले लेने वालों को जहां मुकम्मल सजा नहीं मिल पाती है, वहीं सोशल मीडिया के जरिये अहानिकर ढंग से अपनी बात कहने वाले व्यक्तियों पर शिकंजा कस जाता है। इसे भीड़-तंत्र के आगे प्रशासन का समर्पण ही कहा जाएगा।

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