यह अच्छी बात है कि केंद्र स्पष्ट रुख के साथ सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा है। अशांत क्षेत्रों में सेना को अफस्पा यानी सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) कानून के तहत मिले संरक्षण को वह उसके मूल रूप में बरकरार रखना चाहता है। पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में नई व्यवस्था कायम कर दी। अदालत ने फैसला दिया कि अफस्पा वाले इलाकों में भी अगर मुठभेड़ के दौरान कोई मौत होती है, तो उस मामले में प्राथमिकी दर्ज करना अनिवार्य होगा। केंद्र की राय है कि ये प्रावधान लागू हुआ, तो उससे सुरक्षा बलों की आतंकवाद विरोधी कार्रवाइयां प्रभावित होंगी। जवानों के मन में ये भय रहा कि उनकी गोलियों से कोई दहशतगर्द मरा, तो एफआईआर दर्ज होगी और कानूनन उन्हें अपना बचाव करना पड़ सकता है, तो वे सख्ती दिखाने में हिचकेंगे। तो अब केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में सुधार (क्यूरेटिव) याचिका दी है। मकसद कोर्ट के उपरोक्त आदेश को वापस कराना है। कोर्ट में एटॉर्नी जनरल ने कहा कि भारतीय सेना को परिस्थितियों के अनुसार त्वरित निर्णय लेने की शक्तियां देनी ही होंगी। असामान्य परिस्थितियों में की गई उनकी कार्रवाई पर वैसी पड़ताल नहीं हो सकती, जैसी सामान्य मौतों के बाद होती है। यानी सरकार का तात्पर्य है कि सैन्य कार्रवाइयों के दौरान लोगों के हताहत होने की घटनाओं को न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं लाया जा सकता।


जिस रोज ये दलील कोर्ट में रखी गई, उसी दिन कश्मीर का एक व्यग्र करने वाला वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। उसमें वहां के लोगों के एक हुजूम को सीआरपीएफ जवानों का सामूहिक उत्पीड़न करता देखा गया। उससे सामने आया कि अशांत क्षेत्रों में हमारे जवान किन विकट परिस्थितियों में काम करते हैं। वैसे में उनके माथे पर एफआईआर या मुकदमे की तलवार भी लटकती रहे, इससे उनके मनोबल पर पड़ने वाले असर को समझा जा सकता है। बेशक सुप्रीम कोर्ट का उद्देश्य सुरक्षा बलों को जवाबदेह बनाना तथा आम नागरिकों के मानवाधिकारों की रक्षा करना था। इन मकसदों पर किसी को एतराज नहीं हो सकता। लेकिन गौरतलब है कि अफस्पा संसद से पारित अधिनियम है, जिसकी संवैधानिकता की पुष्टि खुद सर्वोच्च न्यायालय कर चुका है। ये कानून अशांत क्षेत्रों की हकीकत को ध्यान में रखते हुए बनाया गया। समझ है कि जब सेना हथियारों से लैस उपद्रवियों का सामना कर रही हो, तो उसे बेखौफ अपनी ताकत के इस्तेमाल की छूट होनी चाहिए। आशा है कि क्यूरेटिव याचिका पर अगली सुनवाइयों के समय केंद्र अपने तर्कों की सार्थकता न्यायालय को समझाने में कामयाब रहेगा। इसके साथ ही अपेक्षित है कि वह अशांत क्षेत्रों में आम लोगों को अफस्पा का औचित्य बताने और उनका विश्वास जीतने का सघन अभियान चलाए। उन इलाकों में असंतोष बढ़ने के कारण ही ये मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा था। अगर वहां ठीक से जनसंवाद हो, तो आशा की जानी चाहिए कि सेना के मिले संरक्षण पर उन क्षेत्रों के लोगों को भी कोई आपत्ति नहीं होगी।

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