यह अच्छा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने सफाई कर्मियों की मौतों पर चिंता जताते हुए यह टिप्पणी की कि दुनिया में कहीं भी लोगों को बिना सुरक्षा उपकरणों के सीवर की सफाई के लिए नहीं भेजा जाता। चूंकि भारत में ऐसा किया जाता है, इसलिए गैस चैंबर सरीखे सीवरों में उतरकर उनकी सफाई करने वाले कर्मियों की मौत की खबरें रह-रहकर आती ही रहती हैं। सुप्रीम कोर्ट की मानें तो हर माह चार-पांच सफाई कर्मियों की मौत हो जा रही है। ये मौतें गरीब सफाई कर्मियों की अनदेखी का परिणाम हैं। सभ्य समाज को शर्मसार करने और घोर संवेदनहीनता को प्रकट करने वाली ये मौतें इसीलिए होती हैं, क्योंकि सीवरों की साफ-सफाई के लिए जिम्मेदार लोग सफाई कर्मियों की सुरक्षा की तनिक भी परवाह नहीं करते। ऐसा नहीं है कि ऐसे लोग इससे परिचित न हों कि सीवर साफ करने वाले कर्मियों को किन सुरक्षा उपकरणों से लैस होना चाहिए, लेकिन वे आवश्यक सावधानी बरतने से इनकार करते हैं। इस प्रवृत्ति से स्थानीय निकायों के साथ-साथ राज्य सरकारें भी अच्छी तरह अवगत हैं, लेकिन कोई नहीं जानता कि वे संवेदनशीलता का परिचय देने में आनाकानी क्यों कर रही हैं? जब भी कभी सीवर साफ करने उतरे सफाई कर्मियों की मौत की खबर आती है, तब जांच और कार्रवाई के आदेश तो दे दिए जाते हैं, लेकिन आम तौर पर वे निष्प्रभावी ही साबित होते हैं। इसका प्रमाण यह है कि ऐसे मामलों में किसी को भी सजा नहीं दी जा सकी है। कई बार तो यह भी देखने में आता है कि मृतक सफाई कर्मियों के परिजनों को समय पर मुआवजा भी नहीं मिल पाता।

हमारे नीति-नियंताओं को यह बुनियादी समझ्ा होनी ही चाहिए कि जोखिम के बावजूद सफाई कर्मियों को सीवरों में उतारना एक तरह से जान-बूझ्ाकर उनकी जान से खेलना है। इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि सफाई कर्मियों की मौतों पर क्षोभ जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्थितियों में सुधार लाने को कहा, क्योंकि उसकी ओर से केंद्र सरकार को कोई स्पष्ट आदेश्ा-निर्देश्ा नहीं दिए गए। इसका एक कारण यह हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट सफाई कर्मियों की मौतों पर नहीं, बल्कि एससी/एसटी एक्ट के प्रावधानों में बदलाव को लेकर सुनवाई कर रहा था।

यह आवश्यक है कि शीर्ष अदालत इसकी चिंता करे कि उसने सफाई कर्मियों के हित में जो भी कदम उठाने की जरूरत जताई है, उसकी पूर्ति हो। इसी के साथ केंद्र सरकार से भी यह अपेक्षा की जाती है कि वह राज्य सरकारों को सफाई कर्मियों की मौतों के मामले में आगाह करे और आवश्यक हो तो वांछित नियम-कानून बनाने की दिशा में आगे बढ़े।