केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अगुआई में मोदी सरकार ने कश्मीरियों का दिल जीतने की जो मुहिम शुरू की है, उसमें सफलता मिले, यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। इसके साथ ही केंद्रीय सत्ता को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि कश्मीर में अलगाववादी और पाकिस्तान-परस्त तत्वों पर लगाम लगे, क्योंकि इन तत्वों की सक्रियता पर रोक लगाए बगैर केंद्रीय योजनाओं को जमीन तक पहुंचाने और ऐसा करके कश्मीरियों का दिल जीतने के लक्ष्य को हासिल करना कठिन हो सकता है। इससे इनकार नहीं कि पिछले कुछ समय में अलगाववादी तत्वों पर एक हद तक लगाम लगी है, लेकिन फिलहाल इस नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता कि उनका दुस्साहस पस्त पड़ चुका है। हुर्रियत कांफ्रेंस सरीखे शरारती संगठनों की आतंक-परस्ती और पाकिस्तान भक्ति पहले जैसी नजर आ रही है। इसके अलावा इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि कश्मीर घाटी में मजहबी कट्टरता और आतंकवाद को नए सिरे से हवा देने की कोशिश की जा रही है। पिछले दिनों अल-कायदा की ओर से दी गई गीदड़ भभकी यही बताती है कि कश्मीर घाटी को जिहादी आतंकवाद का गढ़ बनाने की कोशिश हो रही है। ध्यान रहे कि ऐसी कोशिश पहले भी होती रही है और इसका प्रमाण यह है कि वहां रह-रहकर खूंखार आतंकी संगठन आईएस के काले झंडे लहराए गए हैं। इस सबके अलावा यह तो जगजाहिर ही है कि पाकिस्तान कश्मीर को अशांत एवं अस्थिर रखने की अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है।

अमन-पसंद आम कश्मीरियों का दिल जीतने के लक्ष्य को हासिल करने में मुख्यधारा के राजनीतिक दल भी बाधक बन सकते हैं। इसकी पुष्टि तब हुई थी जब नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी ने पंचायत चुनाव के बहिष्कार का फैसला किया था। यह फैसला इस बहाने किया गया था कि केंद्र सरकार अनुच्छेद 35-ए एवं अनुच्छेद 370 को हटाने के इरादे जाहिर कर रही है। इन राजनीतिक दलों को इस पर भी आपत्ति थी कि सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 35-ए की संवैधानिकता पर सुनवाई क्यों कर रहा है? अब तो सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 370 पर भी सुनवाई करने को तैयार है। देखना है कि अब नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी क्या रवैया प्रदर्शित करती हैं? उनका रवैया जो भी हो, इस बात को ओझल नहीं किया जा सकता कि फिलहाल ये दोनों दल यह मांग करने में लगे हुए हैं कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा के चुनाव जल्द हों। नि:संदेह राज्य में विधानसभा चुनाव कराने ही होंगे, लेकिन बेहतर होगा कि पहली प्राथमिकता वहां के हालात सुधारने को दी जाए। हालात सुधरने पर ही केंद्रीय योजनाओं पर आसानी से अमल किया जा सकेगा।

यह सही है कि राज्यपाल शासन विभिन्न क्षेत्रों में नए तौर-तरीकों का इस्तेमाल करने में लगा है, पर अब भी बहुत कुछ बदलने की जरूरत है। उम्मीद है कि राज्यपाल के नए सलाहकार फारूक खान के आने से स्थितियां बदलेंगी। वास्तव में जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन में वृद्धि को केंद्र सरकार को अवसर में तब्दील करना चाहिए, क्योंकि इसके आसार कम हैं कि वहां के सियासी दल हालात बदलने में मददगार साबित होंगे।