प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंतत: अपने समर्थकों को भी खरी भाषा में पैगाम दिया है। उन्हें दोटूक लहजे में 'सबका साथ-सबका विकास" की अपनी सोच का मतलब समझाया। मोदी ने कहा कि उनकी सरकार सभी 125 करोड़ भारतीयों के साथ खड़ी है, चाहे उनकी जाति या मजहब कोई भी हो। उनकी सरकार उनमें से प्रत्येक की प्रगति के लिए काम करेगी। प्रधानमंत्री ने इस बार अपने संदेश को यहीं तक सीमित नहीं रखा, बल्कि कहा कि अपने देश में हर पंथ को समान अधिकार है। यह समानता सिर्फ कानून के समक्ष ही नहीं, बल्कि समाज के समक्ष भी है।

कहा जा सकता है कि मोदी ने भारतीय संविधान की मूलभूत भावना की पुनर्पुष्टि की और उसके प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। आशा है कि इससे पिछले महीनों में उत्पन्न् कुछ भ्रमों पर विराम लगेगा। सालभर पहले मोदी के विकास और सुशासन के एजेंडे को भारतीय मतदाताओं ने अप्रत्याशित समर्थन दिया। मोदी उस जनादेश के मूल स्वरूप के प्रति हमेशा सचेत रहे हैं। मगर संघ परिवार के कुछ नेताओं या समूहों के बयानों/गतिविधियों से जब-तब राष्ट्रीय विमर्श के भटकने की आशंका बनती रही है। पहले भी प्रधानमंत्री ने उस पर लगाम लगाने की कोशिश की। मगर इस बार उन्होंने गलतफहमी की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी।

उनसे इंटरव्यू के दौरान एक समाचार एजेंसी की तरफ से पूछा गया कि वे अपनी पार्टी के उन तत्वों पर कैसे नियंत्रण लगा पाएंगे, जो सांप्रदायिक आधार पर नफरत फैला रहे हैं। मोदी ने उसका जवाब दिया - 'कुछ दुर्भाग्यपूर्ण टिप्पणियां की गई हैं, जो पूर्णत: अवांछित थीं। हमारा संविधान हर नागरिक की धार्मिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है, जिस पर कोई समझौता नहीं हो सकता। मैंने पहले भी कहा है और फिर कह रहा हूं कि किसी समुदाय के प्रति कोई भेदभाव या हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी।" बेशक प्रधानमंत्री की इस स्पष्ट घोषणा से देश में विश्वास बढ़ेगा। इससे सरकार और समाज की सारी ऊर्जा लोगों की बेहतरी में लगाने के लिए अनुकूल स्थितियां बनेंगी।

नरेंद्र मोदी ने 'अच्छे दिन" लाने का वादा किया था, जिस पर भारतीय जनता ने यकीन किया। स्वाभाविक ही है कि उनकी सरकार को रोजमर्रा के स्तर पर इस शब्द की कसौटियों पर कसा जाता है। मोदी ने कहा कि 'अच्छे दिन" आ चुके हैं। इसकी व्याख्या उन्होंने पूर्व यूपीए सरकार के दौरान घोटालों और उसकी विफलताओं से पैदा हुई हताशा से आज के वक्त की तुलना करते हुए की। परंतु इस बिंदु पर लोगों की अपेक्षाएं कहीं अधिक हैं। इससे तो सहमत हुआ जा सकता है कि जो मायूसी उन दिनों छाई थी, उससे देश उबरा है। मगर रोजगार, आर्थिक विकास, बुनियादी सुविधाओं और जनोन्मुखी प्रशासन के मोर्चों पर अभी काफी कुछ करने की जरूरत है।

बेशक मोदी इसके प्रति जागरूक हैं। तभी उन्होंने अवांछित भटकाव वाली बातों से अपने समर्थकों को दूर रहने को कहा, ताकि उनकी सरकार जनता की ऊंची अपेक्षाओं को पूरा करने की दिशा में निर्बाध आगे बढ़ सके।