अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान से मुलाकात के दौरान कश्मीर पर मध्यस्थता करने की इच्छा जताकर भारत के साथ अमेरिकी प्रशासन को भी असहज करने का काम किया है। इसकी पुष्टि खुद अमेरिकी विदेश मंत्रालय के इस स्पष्टीकरण से होती है कि कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच का मसला है। यह पहली बार नहीं जब बिना विचारे कुछ भी बोलने के आदी ट्रंप ने कश्मीर पर मध्यस्थता की इच्छा प्रकट की हो। वह 2016 में भी ऐसी इच्छा जाहिर कर चुके हैं, लेकिन इस बार वह यहां तक कह गए कि दो हफ्ते पहले खुद भारतीय प्रधानमंत्री ने उनसे कश्मीर पर मध्यस्थता का आग्रह किया था। अमेरिकी राष्ट्रपति जापान के ओसाका में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन में नरेंद्र मोदी से अपनी मुलाकात का जिक्र कर रहे थे, किंतु उस बातचीत के विवरण में तो वैसा कुछ भी नहीं था, जैसा ट्रंप ने दावा किया। ट्रंप ऐसे आधारहीन दावे करने में किस कदर माहिर हैं, इसकी बानगी आए दिन मिलती रहती है। चंद दिनों पहले ही उन्होंने यह हास्यास्पद दावा किया था कि अमेरिका के दबाव के चलते पाकिस्तान ने दस साल से छिपे मुंबई हमले के गुनहगार हाफिज सईद को गिरफ्तार किया। अमेरिकी राष्ट्रपति कूटनीतिक श्ािष्टाचार को दरकिनार कर भी खूब बयान देते रहते हैं। इसका नमूना उनका यह कथन है कि वह एक करोड़ अफगानियों को मारना नहीं चाहते, अन्यथा एक सप्ताह में ही अफगानिस्तान का युद्ध जीत सकते हैं। उन्होंने यह बेढब बयान भी इमरान खान से मुलाकात के दौरान दिया। इस पर हैरानी नहीं कि नाराज अफगानिस्तान ने अमेरिका से सफाई मांगी है।

अमेरिकी राष्ट्रपति के विचित्र बयान पर भारत में हलचल मचनी ही थी, लेकिन अगर कोई यह समझ रहा है कि नरेंद्र मोदी अथवा अन्य कोई भारतीय प्रधानमंत्री अमेरिकी राष्ट्रपति से कश्मीर पर मध्यस्थता करने का आग्रह कर सकता है तो यह अकल्पनीय ही है। शिमला समझौते के बाद से देश की हर सरकार ही नहीं, सभी राजनीतिक दलों की यही साझा नीति रही है कि कश्मीर द्विपक्षीय मसला है और इस पर किसी अन्य देश को दखल देने का अधिकार नहीं।

विडंबना यह है कि कुछ विपक्षी नेता अमेरिकी राष्ट्रपति के बयान पर भारतीय प्रधानमंत्री से स्पष्टीकरण चाह रहे हैं और वह भी तब जब पहले विदेश मंत्रालय ने ट्रंप के बयान का खंडन किया और फिर विदेश मंत्री एस. जयशंकर व रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी। विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री की ओर से संसद में सब कुछ स्पष्ट किए जाने और अमेरिकी प्रशासन के पिछले पांव पर आ जाने के बाद इसका कोई औचित्य नहीं कि ट्रंप के बयान को तूल देकर राजनीतिक बढ़त हासिल करने की कोशिश की जाए।

दुर्भाग्य से राहुल गांधी समेत कुछ अन्य नेता यही करने में लगे हैं। ट्रंप के बयान के बाद विदेश नीति और खासकर कश्मीर नीति को लेकर जैसी अपरिपक्व और छिछली राजनीति देखने को मिल रही है, वह जाने-अनजाने शरारती पाकिस्तान को बल प्रदान करने और साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति की कूटनीतिक नादानी को अहमियत देने वाली है।

Posted By: Ravindra Soni

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