जम्मू-कश्मीर के उधमपुर में पाकिस्तानी आतंकवादी नावेद उर्फ उस्मान उर्फ कासिम खान के जीवित पकड़े जाने के बारे में आधिकारिक बयान देते हुए गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में कहा - 'हमें विश्वास है कि गिरफ्तार आतंकवादी से पूछताछ से उनकी (सीमापार स्थित आतंकवादी गुटों की) कार्यप्रणाली के बारे में जानकारी मिलेगी।"

पाकिस्तान दहशतगर्दी से लड़ने और 'हर तरह के आतंकवाद की निंदा" करने के अपने बयानों के प्रति ईमानदार होता, तो ऐसा बयान वहां की सरकार की तरफ से आना चाहिए था। इसलिए कि 23 साल के नावेद ने पुष्टि कर दी है कि वह और उसके साथी पाकिस्तान से आए।

नावेद से मिली जानकारियों के आधार पर राजनाथ सिंह ने बताया कि लश्करे-तैयबा के सदस्य इस दहशतगर्द का घर फैसलाबाद में है। पिता का नाम मोहम्मद याकूब है। उसके दो और भाई तथा एक बहन है। वह जंगल के रास्ते भारत आया। अपने साथी के साथ मिलकर उसने बीएसएफ के काफिले पर हमला किया, जिसमें 2 जवान शहीद हुए और 10 घायल हो गए। नावेद ने कुछ लोगों को बंधक बनाया। तभी ग्राम रक्षा दल के सदस्यों ने उसे दबोच लिया। उसका एक साथी मुठभेड़ में मारा गया, जिसका नाम नोमान उर्फ नोमी था।

ये सभी ठोस जानकारियां हैं। आतंकवाद से लड़ने में दिलचस्पी होती, तो पाकिस्तान इन्हें अपने लिए अहम सुराग मानता। नावेद व नोमी के सूत्रधारों तक पहुंचने के प्रयास में जुटता। यह बताता है कि 26 नवंबर 2008 में मुंबई पर आतंकी हमले के बाद से पाकिस्तान में कुछ नहीं बदला है। मुंबई पर हमले को कैसे पाकिस्तान से संचालित किया गया, इसका विवरण अब खुद वहां की खुफिया संस्था फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एफआईए) के पूर्व महानिदेशक तारिक खोसा ने सामने रख दिया है। खोसा ने पाकिस्तान से सच का सामना करने का साहस दिखाने की अपील की। लेकिन वहां के हुक्मरान ऐसा कैसे कर सकते हैं, जब आतंकी संगठनों को उनका संरक्षण मिला हुआ हो?

मुंबई हमलों के दौरान पकड़े गए आतंकी अजमल कसाब के मामले में पाकिस्तान की पहली प्रतिक्रिया उसे पाकिस्तानी मानने से इनकार की थी। वही दोहराव नावेद के मामले में हुआ है। ऐसे में जिस वक्त भारत व पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की मुलाकात की तैयारी चल रही है, यह सवाल लाजिमी है कि आखिर इस वार्ता से क्या हासिल होगा?

खबर है कि उस वार्ता में रखने के लिए पाकिस्तान बलूचिस्तान और दूसरी जगहों पर अशांति फैलाने में भारत की कथित भूमिका के साक्ष्य जुटा रहा है। यानी अपने फर्जी सबूतों से वह नावेद और नोमी से जुड़े असली साक्ष्यों का मुकाबला करेगा। ऐसे में समाधान की कम, कड़वाहट बढ़ने का अंदेशा ज्यादा है। तो भारत ऐसी बातचीत में क्यों रुचि ले रहा है? क्या बेहतर तरीका यह नहीं होगा कि पाकिस्तान को सख्त भाषा और उसकी हरकतों के अनुरूप कदमों से जवाब दिया जाए?