टेलीविजन पर जब खबर देखी तो दिल झुलस गया। कैसे जा सकते हैं पंडित जसराज? वे तो अनंत हैं! उनके गान समान उनकी श्रुति, उनका स्वर नश्वर नहीं। उनकी 'मां कालिका भवानी तो चिर हैं। लेकिन समाचार कठोर था। अब संगीत मार्तण्ड हमारे बीच नहीं रहे। तबला चुप हो गया है, उनके समीप। तानपूरा खामोश। उनकी आवाज में जो घुंघरू खेलते थे, वे पूछ रहे हैं- कैसे थिरकें हम? जो घंटियां बोलती थीं उस ही आवाज में, वे बीच गति में थम-सी गई हैं। कौन झंकारे हमें? और जो शहनाई गूंजती थी उस कंठ में, वह घूम-घूमकर पूछ रही है- कौन मुझे अब ललकारेगा?

पंडितजी चिर-तपस्या में हैं, प्रश्नोत्तरी से परे।

क्या इंसान थे वे, कितनी बुलंद उनकी आवाज, कितना बुलंद उनका संगीत! और प्रतिभा उनकी अद्वितीय, अनुपम!

मंच पर जब वे आते तो लगता कि एक व्यक्ति नहीं, एक संस्कृति पधार रही है। मनुष्य नहीं, विरासत आ रही है। दोनों बांहें उठाए 'जय हो जय हो कहते या फिर मां कालिका भवानी के नाम का उच्चारण करते हुए वे विराजते तो सभा एक दूसरे ही लोक में प्रवेश कर जाती। और जब तानपूरे की श्रुति संवारने के बाद संगीत शुरू होता तो एक स्वर्णिम संदूक खुलता और उसके महकते रत्न एक के बाद एक प्रकट होने लगते।

उनका जाना एक उज्ज्वलित हीरे को खोना है, संगीताकाश में एक ऐसे ओजस्वी नक्षत्र का ओझल होना है, जो कि कभी न मिटने वाला ध्रुव लगता था।

समाचार से यह सूचना भी मिली कि जसराज-जी की उम्र 90 बरस की थी। आश्चर्य! हालांकि इधर कुछ चार-पांच साल से वे तनिक संकुचित लग रहे थे, उनकी अमरता, अमर्त्यता अक्षुण्ण लगती थी। वृक्ष के सब पत्ते हिल कर गिर जा सकते हैं, लेकिन यह स्वर्ण-पर्ण चिरायु है, ऐसा मैं माने हुए था।

मूर्ख जो हूं! चिरायु तो क्या, दीर्घायु भी कौन रहा है?

क्या तानसेन? क्या हमारे युग के महान 'हिंदुस्तानी गायक सवाई गंधर्व, उस्ताद करीम खान, विष्णु दिगंबर पालुस्कर, उस्ताद बड़े गुलाम अली खान, पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर, बेगम अख्तर, सिद्धेश्वरी देवी, पंडित भीमसेन जोशी, गंगूबाई हंगल, पंडित कुमार गंधर्व, केसरबाई केलकर, किशोरी अमोणकर..? और कर्नाटक शैली के कई महान गायक भी हमारे सामने, हमारे देखते-देखते...! अरियाकुडी रामानुज आयंगर, सुब्बालक्ष्मी, एमडी रामनाथन, पत्तम्मल, महाराजापुरम विश्वनाथ अय्यर, वसंताकुमारी, मदुरै मणि अय्यर, बृंदा-मुक्ता, सेम्मनगुडी श्रीनिवास अय्यर... सब एक-एक कर चिरनिद्रा में लीन नहीं हुए हैं?

सब! हमें निर्धन बना गए हैं।

हां, मैं जानता हूं कि हम खुद से और औरों से कहें कि 'वे गए किंतु उनका संगीत नहीं गया है...वह अमर है। सही बात, बिल्कुल सही बात! 'साउंड तकनीकी के अद्भुत तोहफे हमें तरह-तरह के उपायों से नए-पुराने संगीत से जोड़े रखते हैं। पहले रिकॉर्ड होते थे। कुछ मेहनत होती थी उन्हें चलाने में। रिकॉर्डों को 'प्लेयर पर कायदे से बिठाना होता था। फिर सुई चढ़ानी पड़ती थी सांप जैसे सुई के हाथ पर। फिर चाबी देनी पड़ती थी, हैंडल को घुमा-घुमाकर। और जब संगीत शुरू होता था, तब मेहनत का पुरस्कार आता...आह!

फिर एलपी आए, कैसेट्स की कृपा आई, सीडीज की मेहरबानी हुई। और अब यूट्यूब क्या गजब! केवल आवाज नहीं, साथ-साथ छवि भी। वाकई, तकनीकी ने संगीत को समय से अलग कर दिया है, नश्वर को अमर बना दिया है। उस दृष्टिकोण से कलाकार नश्वर हैं, उनकी कला अमर!

इसमें नि:संदेह प्रगति है। प्रगति की गति वैसे बहुमुखी है, बहुरूपा। प्रगति-दत्त सुविधा का स्वागत है।

किंतु निस्सीम सुविधा?

बटन दबाइए और घर बैठे संगीत सुनते रहिए। बैठे-बैठे ही नहीं, लेटे-लेटे, खाते-खाते, पीते-पीते। अभी खयाल लगाया और दूसरे क्षण टप्पा। अभी भजन और अगले लम्हे कव्वाली। पंडित भीमसेन जोशी के मालकौंस में आलाप चल रहा है और मन ने कहा बस, तो बस! मझधार चलाइए किशोरी अमोणकर। कुमार गंधर्व का 'उड़ जाएगा हंस अकेला पूरी उड़ान में है, मन ने कहा 'चेंज! तो... डागर बंधुओं का ध्रुपद!

यूट्यूब के और भी अवतार आवेंगे। और भी सुविधाजनक, और भी रोचक, आकर्षक! ईयरफोन्स लगाकर, ब्लूटूथ के जरिए टहलते-फिरते, सुनते-सुनते चलिए!

'सुनते-सुनते कहा मैंने! पर क्या इन प्रक्रियाओं में हम वास्तव में सुन रहे हैं सगीत को? अथवा केवल सुनने के बाहरी रूप से खेल रहे हैं? खुद को बहका रहे हैं? और इन प्रश्नों से आगे- क्या इसमें हम कुछ खो रहे हैं?

तकनीकी में है सुविधा, अवश्य है, लेकिन उसके अंदर एक प्रकार का, क्या कहूं, एक प्रकार का विलास है, जिसमें आदर कम, आराम अधिक है, ढंग कम, ढील अधिक है, औचित्य कम, अशिष्टता अधिक है। अनगित विकल्प मोहक हैं, लेकिन उनके अनगिनत उपयोग में संगीत, विशेषकर शास्त्रीय संगीत के अनुभव का ह्रास होता है।

हिंदुस्तानी संगीत के अनुभव के लिए संयम आवश्यक है, मन की एकाग्रता आवश्यक है। उसका सेवन उठते-बैठते करना अपूर्ण तो है ही, साथ मेरी समझ में अशिष्ट भी। सुनने की भिन्न् तकनीकियों का सही उपयोग हो सकता है और गलत भी। मन को, चित्त को शांत बनाकर, अन्य व्यापक आवाजों को निम्न कर अगर हम लैपटॉप पर, या अन्य साधन पर सुनें तो संगीत का अनुभव काफी हद तक मिल सकता है। सीधे विद्वान या उस्ताद के आगे सुनने में जितना मिल सकता है, उतना नहीं, लेकिन फिर भी काफी मात्रा में मिल सकता है। लेकिन 'सही उपयोग आसान नहीं। समय बदल जो गया है। हर चीज तुरंत चाहिए। हर जरूरत, झट!

कहां सभा में दो-तीन घंटे बैठकर संगीत का अनुभव, कहां घर में, हजार गड़बड़ियों, उथल-पुथल के बीच?

इस मायने में हर कलाकार का निधन अपूरणीय है। रिकॉर्डिंग्स रहेंगी जरूर, लेकिन छाया-रूपी। जीरो से एक जरूर बेहतर है। शून्यता से रिकॉर्ड बेहतर। पर जो खोया है, वह सौ है। पूरा सौ का सौ। और उसके स्थान पर अब एक है- रिकॉर्ड की आवाज!

लेकिन हमें एक जगह से हौसला मिलता है। वह 'जगह है श्ािष्यत्व, शागिर्दी। हर कलाकार अपने में गुरु है। और शिष्यों के जरिए, शिष्यों की श्र्ाृंखला के जरिए चिरायु है। तब ही तो 'घराने बनते हैं। तब ही तो 'वाणी बनती है। कला-दीपक एक लौ से दूसरे लौ तक चलता रहता है, अडिग, अटल! पंडित जसराज अपनी रिकॉर्डिंग्स से और अपने शिष्यों के माध्यम से अपने रसिकों तक पहुंचते रहेंगे। वे अमर हैं, उनका संगीत अजर है।

एक विषय उठाकर पाठक से आज्ञा लूंगा। कोविड-19 ने कला के रंगमंच को हिला दिया है। सभाएं फिर कब-से जमेंगी? क्या महफिलों का अंत हो गया है? दूरी रखने की मजबूरी कला के रसास्वादन के लिए घातक है, और कलाकारों के लिए भी। विशेषकर उन कलाकारों के लिए जो कि बड़े कलाकारों की संगत करते हैं। उनकी आमदनी आज घायल है। मंच नहीं, आजीविका नहीं। ऑनलाइन संगीत कहां तक उनकी सहायता कर सकता है? आज कलाकार संकट में हैं, कला संकट में है। ऐसे समय में पंडित जसराज का जाना... असह्य है!

(लेखक पूर्व राजनयिक व पूर्व राज्यपाल हैं और वर्तमान में अध्यापक हैं)

Posted By: Ravindra Soni

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