प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बांग्लादेश यात्रा में सबसे ज्यादा ध्यान दोनों देशों के बीच 162 बस्तियों की अदला-बदली की सहमति को कार्यरूप देने पर ही रहा, मगर इस दौरान ऐसे दूसरे करार भी हुए, जो बेशकीमती हैं। इनसे भारत को प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रणनीतिक व आर्थिक लाभ होंगे।

मसलन, एक समझौते के तहत भारतीय मालवाहक जहाजों को बांग्लादेश के चटगांव और मोंगला बंदरगाहों के इस्तेमाल का अधिकार मिला है। चटगांव बंदरगाह को चीन ने विकसित किया। रणनीतिक हलकों में इसे भारत को घेरने की उसकी योजना हिस्सा माना जाता था। चीन बांग्लादेश के कोक्स बाजार तट के पास सोनडिहा द्वीप पर भी बंदरगाह बना रहा है। अब बांग्लादेशी बंदरगाहों पर भारतीय जहाजों का पहुंचना आर्थिक रूप से तो फायदेमंद होगा ही, साथ ही उससे चीन के पसरते पांवों पर लगाम लगाने में भी मदद मिलेगी।

इससे बांग्लादेश के साथ द्विपक्षीय संबंधों में गुजरे वर्षों में बने संदेहों का समाधान होगा। इसके अलावा भारतीय कंपनियों द्वारा बांग्लादेश के ऊर्जा क्षेत्र में निवेश तथा भारत से बांग्लादेश को अधिक बिजली की बिक्री के करार और दोनों देशों के बीच शुरू हुई बस सेवाओं से भी दोनों देशों की आर्थिक खुशहाली का रास्ता खुलेगा। प्रधानमंत्री ने बांग्लादेश को दो अरब डॉलर का कर्ज देने की घोषणा की। यह रकम बुनियादी ढांचा विकास, बिजली, स्वास्थ्य एवं शिक्षा परियोजनाओं के लिए होगी। इन कार्यों में भारतीय कंपनियों को बड़े ठेके मिलने की आशाएं हैं। उद्योग जगत ने संभावना जताई है कि उनसे भारत में बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर पैदा होंगे।

यह सब संभव होने की पृष्ठभूमि 41 साल से लटके बस्तियों की अदला-बदली के समझौते को अमलीजामा पहनाने से बनी। यह मुद्दा दोनों देशों के रिश्तों में बड़ा कांटा था। एक और ऐसा पेंच तीस्ता नदी के जल बंटवारे का है। मोदी ने संकेत दिया कि जिस तरह उन्होंने बस्तियों की अदला-बदली के लिए राजनीतिक सहमति बनाई, आगे वैसा ही प्रयास वे तीस्ता करार के मामले में करेंगे। इन दोनों समझौतों में बड़ी रुकावट पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और खुद भारतीय जनता पार्टी थी। मोदी की दूरदृष्टि के कारण भाजपा अपना विरोध वापस ले चुकी है, जबकि ममता बनर्जी को मोदी अपने साथ बांग्लादेश यात्रा पर ले जाने में कामयाब रहे। अत: यह उम्मीद निराधार नहीं है कि तीस्ता का मसला भी देर-सबेर हल हो जाएगा। तब दोनों देशों के बीच वैसी मित्रता साकार रूप ले सकेगी, जिसकी संभावना 1971 में बांग्लादेश के निर्माण में भारत के ऐतिहासिक योगदान से पैदा हुई थी।

बांग्लादेश युद्ध के दौरान तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को शेख हसीना की सरकार ने 2011 में 'बांग्लादेश स्वाधीनता सम्मान" और उस समय विपक्ष के नेता रहे अटल बिहारी वाजपेयी को अब 'बांग्लादेश मुक्ति संग्राम मित्र" सम्मान से सम्मानित कर भारत के उस योगदान को स्वीकार किया है। जाहिर है, चार दशक पहले लगे मित्रता के पौधे के फूलने-फलने का मार्ग अब प्रशस्त हुआ है। यही मोदी की यात्रा की सफलता है।