नोएडा को दिल्ली से जोड़ने वाले रास्ते पर शाहीन बाग इलाके में पिछले तकरीबन दो माह से जारी धरने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने यह सही कहा कि विरोध प्रदर्शन करना लोगों का अधिकार है, लेकिन इस तरह किसी मार्ग को बाधित नहीं किया जा सकता। उसने यह सही सवाल उछाला कि अगर हर कोई इस तरह सड़कों पर उतरकर उन्हें बाधित करने लगेगा तो क्या होगा? नि:संदेह इससे अराजकता ही पैदा होगी और इसकी इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती।

लोगों को यह समझना चाहिए कि हर अधिकार की अपनी सीमाएं होती हैं। कोई अधिकार असीमित नहीं हो सकता। विरोध, हड़ताल अथवा आंदोलन के अधिकार के नाम पर लोग सड़क अथवा रेल मार्ग बाधित नहीं कर सकते, लेकिन दुर्भाग्य से अपने देश में ऐसा ही अधिक होता है। यह और कुछ नहीं, आम लोगों को बंधक बनाने वाला कृत्य है। कई बार तो ऐसे कृत्यों के कारण लाखों लोगों की दिनचर्या प्रभावित होती है। शाहीन बाग धरना भी यही कर रहा है। इससे खराब बात और कोई नहीं कि सड़क पर कब्जा करके दिए जा रहे जिस धरने के कारण बीते दो महीने से दिल्ली-एनसीआर के लाखों लोगों को परेशानी उठानी पड़ रही है, वह अभी भी समाप्त होता नहीं दिखता। सुप्रीम कोर्ट ने शाहीन बाग धरने को लेकर अपनी चिंता अवश्य जताई, लेकिन यह कोई नहीं जानता कि उसने उसे समाप्त करने की जरूरत क्यों नहीं महसूस की?

विरोध के नाम पर मनमानी का प्रदर्शन करने वाले धरने के प्रति नरमी दिखाना कानून के शासन के साथ-साथ शांतिप्रिय लोगों के अधिकारों की अनदेखी ही है। यह ठीक नहीं कि विरोध अथवा असहमति जताने के नाम पर मनमानी बढ़ती ही जा रही है। अब तो विरोध प्रदर्शनों के दौरान आगजनी, पत्थरबाजी और तोड़फोड़ आम है। नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ देश के विभिन्न् हिस्सों में जिस तरह बड़े पैमाने पर आगजनी और तोड़फोड़ हुई, उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है।

इस तरह की हरकतों से सख्ती से निपटा जाना चाहिए, लेकिन यह देखने में आ रहा है कि इस तरह के मामलों में कई बार अदालतें भी नरम रवैया अपना लेती हैं। इससे कुल मिलाकर विरोध के बहाने अराजकता फैलाने वालों को ही बल मिलता है। इसमें संदेह है कि शाहीन बाग में धरने पर बैठे लोग अपना अड़ियल रवैया आसानी से छोड़ेंगे। पहले वे नागरिकता संशोधन कानून वापस लेने पर अड़े थे, फिर यह मांग करने लगे कि सरकार को उनसे बात करने धरना स्थल आना चाहिए। इसके बाद उन्होंने हजारों की संख्या में एकत्रित होकर गृहमंत्री से कथित तौर पर वार्ता करने की ठानी। आखिर यह कब समझा जाएगा कि यह धरना आम जनता के सब्र का इम्तिहान ले रहा है?

Posted By: Ravindra Soni

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