आज हमारे देश के लिए आतंकवाद सबसे बड़ी समस्या है और इस आतंकवाद की जड़ कश्मीर में है। कश्मीर वह सिरदर्द है, जिसका कोई हल दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। लेकिन यदि इतिहास के पन्ने पलटकर तटस्थ स्वरूप में देखा जाए, तो भारत के पास ऐसे कई अवसर आए, जब वह कश्मीर का शांतिपूर्ण विलय कर कोई विवाद खड़ा होने की सारी संभावनाएं ही खत्म कर सकता था।

एक बार तो यह तक हुआ था कि कश्मीर के सबसे बड़े नेता शेख अब्दुल्ला ने भी भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सामने कश्मीर को भारत में विलीन कर लेने का आग्रह रखा था। कश्मीर का भारत में विलय तो हुआ, लेकिन दुर्भाग्य से तत्कालीन नेतृत्व की कमजोरियों और ढुलमुल नीतियों ने हालात बिगड़ जाने दिए।

किस्सा सन् 1947 का है। जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब तमाम राजा-महाराजाओं की रियासतें अलग थीं। उनमें से अधिकांश को सरदार वल्लभ भाई पटेल ने भारत में विलीन कर एक देश बनाया। मगर कश्मीर का मामला नेहरू देख रहे थे। सन् 1947 में नेशनल कांफ्रेंस के तत्कालीन अध्यक्ष, प्रधानमंत्री नेहरू के दोस्त और कश्मीर के बड़े नेता शेख अब्दुल्ला ने भी चाहा था कि कश्मीर को भारत में मिला देना चाहिए।

शेख अब्दुल्ला का मानना था कि कश्मीर रियासत इतनी छोटी है कि वह स्वतंत्र रहकर सुरक्षित नहीं रह सकती, क्योंकि बंटवारे के बाद पाकिस्तान ने उस पर कई बार छोटे-मोटे आक्रमण कर अपने नापाक इरादे जता दिए थे। भले ही भय के कारण किंतु शेख चाहते थे कि पूरा कश्मीर भारत के साथ ही रहे। भारत में कश्मीर के विलय के बाद शेख अब्दुल्ला इसके प्रधानमंत्री भी बने। बाद में शेख का मन बदल गया और 1953 के आरंभ में शेख अब्दुल्ला ने स्वतंत्र कश्मीर का राग अलापना शुरू कर दिया।

Posted By: Rahul Vavikar