केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जीएसटी के मौजूदा पांच स्लैब को तीन तक सीमित करने के जो संकेत दिए, वे यही बताते हैं कि सरकार इस टैक्स व्यवस्था को और सरल बनाने की ओर बढ़ना चाह रही है। कहना कठिन है कि वह समय कब आएगा जब शून्य और पांच के अतिरिक्त एक अन्य स्लैब 12 से 18 के बीच होगा, क्योंकि वित्त मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसा राजस्व में अच्छी वृद्धि के बाद ही होगा। फिलहाल यह लक्ष्य थोड़ा कठिन लगता है, क्योंकि जीएसटी दरों को तर्कसंगत बनाने की हर कोशिश राजस्व संग्रह को प्रभावित करती है।

नि:संदेह वस्तुओं और सेवाओं के तीन स्लैब के बाद जीएसटी कहीं अधिक तार्किक होगा, लेकिन जितनी आवश्यकता जीएसटी के स्लैब और उसकी दरों को तर्कसंगत बनाने की है, उतनी ही जरूरत इस टैक्स व्यवस्था पर अमल की प्रक्रिया को सरल बनाने की भी है। इस प्रक्रिया का इतना सरलीकरण होना चाहिए कि कोई भी यह शिकायत न कर सके कि जीएसटी ने उसकी परेशानी बढ़ा दी है। उचित यह होगा कि सरकार के साथ जीएसटी परिषद इस पर विशेष ध्यान दे कि 18 माह पुरानी यह टैक्स व्यवस्था और अधिक सुगम एवं पारदर्शी कैसे बने?

जीएसटी के अमल को सरल बनाना एक सतत प्रक्रिया है, लेकिन उचित यह होगा कि यह टैक्स व्यवस्था अगले वर्ष में प्रवेश करने के पहले हर तरह की जटिलता से मुक्त हो जाए। इसी के साथ यह भी अपेक्षित है कि जीएसटी के तहत राजस्व संग्रह में भी वृद्धि हो। अभी यह अपेक्षा से कम है और शायद इसी कारण जीएसटी में सुधार की गति धीमी है।

इस धीमी गति के लिए वे कारोबारी भी जिम्मेदार हैं, जो दो नंबर में काम करने के आदी हैं और येन-केन-प्रकारेण टैक्स बचाने की जुगत में रहते हैं। आम धारणा है कि कारोबारियों का यही वर्ग जीएसटी की जटिलताओं का रोना रोता है। वास्तविक जटिलताओं का जिक्र करने में हर्ज नहीं, लेकिन उनका इस्तेमाल जीएसटी से बचे रहने की आड़ के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। इस प्रवृत्ति से इसलिए बचा जाना चाहिए, क्योंकि तकनीक के इस युग में टैक्स बचाने के बेजा उपाय अधिक समय तक कारगर रहने वाले नहीं हैं। जीएसटी का मकसद केवल टैक्स व्यवस्था के जटिल ढांचे को दुरुस्त करना भर नहीं, बल्कि देश के विकास को गति देना भी है। कारोबारियों का हित इसी में है कि वे विकास की गति को बल देने में अपना योगदान दें। जब सरकार उनकी अपेक्षाओं को पूरा करने को लेकर गंभीर है तो उन्हें भी उसकी उम्मीदों को पूरा करने में सहायक बनना चाहिए।

यदि सरकार और कारोबारी एक-दूसरे के हितों की चिंता करें तो ऐसी कोई समस्या नहीं, जिसका समाधान न खोजा जा सके। अब जब ज्यादातर भवन निर्माण सामग्री को 28 के बजाय 18 या फिर 12 प्रतिशत टैक्स के दायरे में लाया जा चुका है, तो फिर यह जरूरी है कि रीयल एस्टेट और पेट्रोलियम पदार्थों को भी जीएसटी के दायरे में लाया जाए। रीयल एस्टेट को जीएसटी के दायरे में लाने से राजस्व में वृद्धि के साथ ही इस क्षेत्र की तमाम समस्याओं का समाधान भी होगा।

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