सोनिया गांधी का एक बार फिर कांग्रेस की कमान संभालना इस पार्टी की गांधी परिवार पर निर्भरता को तो दर्शाता ही है, यह भी बताता है कि उसके लिए इस परिवार के बाहर किसी अन्य के नेतृत्व को स्वीकार करना कितना मुश्किल है। इसमें संदेह है कि अंतरिम अध्यक्ष के रूप में सोनिया गांधी के चयन से कांग्रेस का संकट वास्तव में दूर हो सकेगा। सच तो यह है कि राहुल गांधी द्वारा अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद जिस तरह पार्टी लगभग ढाई माह तक अनिश्चितता में फंसी रही और फिर सोनिया गांधी पर ही उसकी आस टिकी, उससे उसकी कमजोरी और अधिक स्पष्ट रूप में सामने आई है।

कांग्रेस यह कह सकती है कि सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष ही बनाया गया है, लेकिन इससे कहीं न कहीं यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि गांधी परिवार के बगैर पार्टी का गुजारा नहीं है। इस फैसले के जरिये कांग्रेस का आगे बढ़ पाना मुश्किल ही है। ऐसा लगता है कि कांग्रेस घूम-फिरकर वहीं पहुंच गई है, जहां से चली थी। बेहतर हो कि आगे बढ़ने के लिए कांग्रेस पहले यह तय कर ले कि उसमें गांधी परिवार के नेतृत्व के बिना आगे बढ़ने की सामर्थ्य है या नहीं?

यह ठीक है कि कांग्रेस का गांधी परिवार से अलग होना आसान नहीं और उसके अस्तित्व का आधार ही यह परिवार है, लेकिन जब खुद राहुल गांधी ने कह दिया था कि गांधी परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति को नेतृत्व सौंपा जाना चाहिए, तब यह आवश्यक हो जाता था कि पार्टी उसी दिशा में आगे बढ़े। यह विचित्र है कि कांग्रेस गांधी परिवार के रूप में जिसे अपनी ताकत समझती है, वही उसकी कमजोरी भी है। इसी ताकत और कमजोरी के कारण कांग्रेस गांधी परिवार को लेकर अपनी दुविधा से उबर नहीं पाती।

निराशाजनक यह है कि कांग्रेस की इस दुविधा का नुकसान देश को भी उठाना पड़ रहा है। एक मजबूत-मुखर विपक्ष की अपनी भूमिका निभाने के लिए कांग्रेस को सबसे पहले नेतृत्व के सवाल को हल करना होगा, ताकि पार्टी को सही दिशा मिले। राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद छोड़ने के साथ ही पार्टी के नेताओं को यह मौका दिया था कि वे नए नेतृत्व की तलाश करें, लेकिन वे इसके लिए आवश्यक साहस नहीं जुटा सके।

साहस का यह अभाव इसलिए है, क्योंकि पार्टी के बड़े नेता एकजुट नहीं हैं और वे भी शक्ति केंद्र के इर्द-गिर्द घूमने की उसी बीमारी की चपेट में आ गए हैं, जिससे कभी कार्यकर्ता ग्रस्त हुआ करते थे। मौजूदा माहौल में पार्टी को अगर मजबूती के साथ आगे बढ़ना है तो उसे अपनी रीति-नीति पर साहसिक फैसलों के लिए तैयार रहना होगा।

Posted By: Ravindra Soni

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