कृषि विधेयकों को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तकरार जिस तरह खत्म होने का नाम नहीं ले रही है, उससे यही प्रकट होता है कि किसान हित के नाम पर अपने-अपने अहं की चिंता ही अधिक की जा रही है। राज्यसभा में जरूरत से ज्यादा हंगामा कर सदन की गरिमा से खिलवाड़ करने वाले सांसदों के निलंबन के बाद भी विपक्ष अब तक यह मानने को कतई तैयार नहीं कि उन्होंने कुछ गलत किया। क्या विपक्ष यह चाह रहा है कि पीठासीन अधिकारी के समक्ष की गई अभद्रता की सर्वथा अनदेखी कर दी जाए? इससे तो संसद में हुड़दंग मचाने वालों को ही बल मिलेगा।

जब सत्तापक्ष सांसदों का निलंबन रद्द करने पर विचार करने को तैयार है, तब ऐसे में विपक्ष को भी चाहिए कि वह अपने हठ को त्याग दे। आखिर यह राजनीतिक हठ नहीं तो और क्या है कि निलंबित सांसद राज्यसभा के उपसभापति की सद्भावना पहल पर भी पसीजने को तैयार नहीं। विपक्ष की ओर से सदन चलाने के लिए तीन शर्तें पेश किया जाना जोर-जबरदस्ती की राजनीति का ही परिचायक है।

संसदीय लोकतंत्र पक्ष-विपक्ष की शर्तों से नहीं, आपसी समझबूझ और आम सहमति की राजनीति से चलता है। जहां विपक्ष को अपनी बात कहने का अधिकार है, वहीं सत्तापक्ष की यह जिम्मेदारी है कि वह उसकी बात सुने, लेकिन यदि कोई एक पक्ष यह चाहेगा कि सदन में वही हो, जो वह चाह रहा है तो यह संभव नहीं। यदि जबरन विधेयक नहीं पास कराए जाने चाहिए तो उन्हें बलपूर्वक रोका भी नहीं जाना चाहिए। इसके अलावा इस पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि लोकतंत्र में संख्याबल मायने रखता है। उसका सम्मान किया जाना चाहिए।

यदि विपक्ष राज्यसभा में संख्याबल में कमजोर है तो इसका यह मतलब नहीं कि वह सत्तापक्ष के शासन करने के अधिकार पर अड़ंगा लगाए। कृषि विधेयकों के पारित होते समय ऐसा ही किया गया। जब सत्तापक्ष और विपक्ष, दोनों का उद्देश्य किसानों के हितों की रक्षा करना है तो फिर यह काम कैसे हो, इस पर सहमति के अभाव का क्या मतलब?

नि:संदेह सहमति कायम करने की जिम्मेदारी सत्तापक्ष की है, लेकिन वह उसका निर्वहन तभी कर सकता है, जब विपक्ष यह समझने को तैयार होगा कि शासन चलाने का अधिकार उसके पास नहीं है। टकराव की राजनीति से किसी के हित नहीं सधने वाले और किसानों के तो बिल्कुल भी नहीं। यह बिल्कुल भी ठीक नहीं कि किसान हित के नाम पर दलगत हितों को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया जा रहा है। यह एक विडंबना ही है कि जब किसानों को यह संदेश देने की जरूरत है कि संसद उनके हितों की रक्षा को तत्पर है, तब पक्ष-विपक्ष में टकराव देखने को मिल रहा है।

Posted By: Ravindra Soni

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