आशीष व्यास

इस बार दो संदर्भ एक साथ। एक बीत चुका और दूसरा आने वाला है। पहले बीता हुआ-अब तक मध्य प्रदेश पर कुपोषण का कलंक अमिट है! बीते बुधवार विधानसभा के मानसून सत्र में फिर से मामला गूंजा, फिर से रस्म निभाते हुए भारी-भरकम आंकड़े पेश हुए और फिर से आरोप-प्रत्यारोप के बाद सबकुछ भुला दिया गया! आंकड़े गवाही देते रहे कि बीते चार माह में हर दिन 61 बच्चों की मौत हो रही है और फिर विधानसभा का सत्र किसी निर्णायक कदम के बगैर खत्म हो गया है! और अब, आज का संदर्भ-डॉक्टर्स-डे (एक जुलाई)।

यह चिकित्सा क्षेत्र में समर्पण व सामाजिक उत्थान के लिए डॉक्टर्स को उनके दायित्व याद दिलाने का दिन है। लगता है कुपोषण के संदर्भ में ऐसे अवसरों का लाभ उठाने, सुधार के संकल्प लेकर समन्वय स्थापित करने में काफी देरी हो गई, तभी कई उपलब्धि धारण कर चुका मध्य प्रदेश इस मर्ज का इलाज ढूंढ नहीं पाया है! वैसे तो कुपोषण को जड़ से मिटाने की सामूहिक जिम्मेदारी केंद्र-राज्य सरकार, डॉक्टर्स, प्रशासनिक तंत्र और जनता की है।

लेकिन, आज दिन डॉक्टर्स का है, इसलिए उन्हीं से सीधी बात, उनकी जिम्मेदारियों-कोशिशों पर सीधा संवाद। डॉक्टर्स की संस्था इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) को देश का सबसे बड़ा एनजीओ माना जाता है। इसमें लगभग साढ़े तीन लाख डॉक्टर्स हैं।

इन दिनों आईएमए इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि महाराष्ट्र शाखा की एक महिला डॉक्टर ने सात साल पहले लड़कियों में एनीमिया दूर करने के लिए अभियान शुरू किया था। धूलिया (महाराष्ट्र) के एक छोटे से गांव की चंद लड़कियों की स्वास्थ्य जांच और जागरूक करने का यह प्रयास आज 50 हजार लड़कियों तक पहुंच चुका है!

उत्साहित करने वाला परिणाम देख आईएमए ने सामाजिक स्वास्थ्य सेवा के तहत इसे 'पिंक हेल्थ मिशन" के नाम से राष्ट्रीय अभियान के रूप शामिल किया है। इसे शुरू करने वाली और मिशन की राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विजया माली से बात करते ही महसूस हो जाता है कि छोटी-सी कोशिश कैसे बड़ा बदलाव ला सकती है।

वे पूरे आत्मविश्वास से कहती हैं -'सात साल में वहां की 40 प्रतिशत लड़कियों को एनीमिया से बाहर निकाल लिया! देश के कई इलाकों में यह अभियान जनवरी से शुरू हो चुका है। मध्य प्रदेश में यह 2 जुलाई को इंदौर से शुरू होगा।" आईएमए मप्र के अध्यक्ष डॉ. नटवर सारडा बात को आगे बढ़ाते हैं - 'इंदौर में डॉक्टर्स-डे पर हम बड़ा कैंप कर रहे हैं। करीब 2000 से ज्यादा लड़कियों का हीमोग्लोबिन टेस्ट होगा। इसके बाद प्रदेश के प्रत्येक जिले में सालभर अभियान चलेगा, प्रदेश के 8000 से ज्यादा डॉक्टर्स सीधे जुड़ेंगे!"

इसी क्रम में एक सवाल मप्र के डॉक्टर्स से। जब देशभर के डॉक्टर्स एकजुट होकर एनीमिया के खिलाफ जंग लड़ सकते हैं, तो प्रदेश के डॉक्टर्स कुपोषण के खिलाफ एक क्यों नहीं हो सकते? क्या यह हमारी सामूहिक चिंता का विषय नहीं होना चाहिए कि मप्र में बीते चार महीने से रोजाना 61 बच्चों की मौत हो रही है और आज भी प्रदेश में 13 लाख बच्चे कुपोषित और एक लाख अति कुपोषित हैं!

महिला बाल विकास मंत्री द्वारा हाल ही में विधानसभा में दिए आंकड़ों के साथ, जब डॉ. माली और डॉ. सारडा के सामने यह सवाल रखा गया तो जवाब था -'अभियान तो बिलकुल शुरू हो सकता है और परिणाम भी निकल सकते हैं।" अपनी बात को विस्तार देते हुए डॉ. माली कहती हैं - 'एनीमिया के खिलाफ जंग तो कुपोषण की पहली सीढ़ी है।

मां स्वस्थ होगी तभी बच्चा स्वस्थ होगा।"आईएमए द्वारा चलाए जाने वाले एक अन्य अभियान 'चलो गांव की ओर" का उल्लेख करते हुए वे बताती हैं -'इसका उद्देश्य ही यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत डॉक्टर्स मिलकर अपने इलाके में फैली बीमारियों और स्वास्थ्य परेशानियों को दूर करने के लिए आगे आएं। मप्र में सबसे खराब स्थिति यदि श्योपुर और खंडवा की है, तो वहीं से ये काम शुरू किया जा सकता है।"

यह बयान मप्र के डॉक्टरों के लिए चुनौती भी है कि महाराष्ट्र में उपचार, जागरूकता और खानपान में सुधारकर बड़ा बदलाव लाया जा सकता है तो मप्र से कुपोषण का कलंक क्यों नहीं मिटाया जा सकता? श्योपुर के न्यूट्रिशियन रीहैबिलिटेशन सेंटर (एनआरसी) के प्रभारी डॉ. संजय मंगल ने बच्चों के इलाज और खानपान पर जोर देना शुरू किया है।

वहीं सिक न्यूबॉर्न केयर यूनिट (एसएनसीयू) प्रभारी और शिशुरोग विशेषज्ञ डॉ. जितेंद्र यादव बच्चों को बाहर रेफर करने के बजाय स्थानीय स्तर पर ही इलाज कर रहे हैं। ग्वालियर के गजराराजा मेडिकल कालेज के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग और आईएमए ने मिलकर बरयी गांव को गोद ले लिया है।

यहां करीब 174 बच्चे हैं, इसमें करीब 74 कुपोषण, अति कुपोषण या आंशिक कुपोषण के शिकार हैं। बच्चों को स्वस्थ-सामान्य करने के लिए प्रत्येक बच्चे पर 4-4 हजार रुपए तक खर्च किए जाएंगे। ये छोटी-छोटी कोशिशें तो शुरू हो चुकी हैं लेकिन, पूरे प्रदेश के डॉक्टर्स का एक साथ आना अभी शेष है! फिर लौटते हैं डॉक्टर्स-डे पर।

यह दिन पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री, स्वतंत्रता सेनानी व डॉक्टर ऑफ साइंस की उपाधि से नवाजे गए डॉ. बिधानचंद्र राय के सेवा और समर्पण को याद करते हुए मनाया जाता है। उनकी मान्यता थी - 'देश में असली स्वराज तभी आ सकता है जब देशवासी तन-मन से स्वस्थ हों।"

आजादी के पहले और बाद के झंझावतों के बीच भी, अपने कार्यक्षेत्र पश्चिम बंगाल में वे जादवपुर टीबी अस्पताल, चितरंजन सेवा सदन, कमला नेहरू अस्पताल, विक्टोरिया संस्थान और चितरंजन कैंसर अस्पताल जैसे कई बड़े चिकित्सा संस्थान स्थापित कर गए। ये 'आज" होने वाली बीमारी से लड़ने के लिए 'कल" किया गया इंतजाम था! क्या मध्यप्रदेश के हजारों डॉक्टर्स उनसे प्रेरणा लेकर आज कुपोषण के खिलाफ जंग नहीं छेड़ सकते ताकि भविष्य में हम भी कह सकें - हमारे 'आज" को सुधारनेसंवारने के लिए वे 'कल" जागे थे!

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