रांची। इस साल के आखिरी में होने वाले झारखंड विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने प्रदेश नेतृत्व में बदलाव किया है। कांग्रेस ने एक बार फिर मुस्लिम-आदिवासी कार्ड खेलते हुए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर पूर्व केंद्रीय मंत्री रामेश्वर उरांव का चुनाव किया है। उरांव के नाम पर लंबे समय तक विचार करने के बाद मुहर लगाई गई है।नई व्यवस्था की खास बात यह भी रही कि नए अध्यक्ष की शक्तियोंं को सीमित करते हुए कांग्रेस ने 5 कार्यकारी अध्यक्षों को मनोनीत किया है।

इसलिए उरांव के नाम पर लगी मुहर

झारखंड में जिले से लेकर केंद्र तक की राजनीति में शामिल रहे डॉ. रामेश्वर उरांव को अपनी शालीनता और अनुभव का फायदा मिला। उरांव की छवि मृदुभाषी नेता की है। हालांकि इस छवि का नुकसान उन्हें पिछले लोकसभा चुनाव में झेलना पड़ा था जब उन्हें टिकट से वंचित कर दिया गया था। चाहकर भी टिकट कटने का उन्होंने व्यापक विरोध नहीं किया था और न ही समर्थकों को सार्वजनिक तौर पर विरोध करने की इजाजत दी थी।

उरांव का राजनीतिक जीवन

  • उरांव 14 फरवरी 1947 को पलामू के चियांकी में पैदा हुए थे। रामेश्वर उरांव ने 1972 में राष्ट्रीय पुलिस सेवा में शामिल होने से पहले रांची विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की थी।
  • 7 अप्रैल, 2008 को रामेश्वर उरांव ने मनमोहन सिंह सरकार के तहत पहली कैबिनेट में एक आदिवासी मामलों के मंत्री के रूप में शपथ ली थी। रामेश्‍वर उरांव लोहरदगा के सांसद भी रह चुके हैं।
  • वे मनमोहन सिंह की पहली सरकार (2004-2009) में आदिवासी मामलों के राज्य मंत्री रहे थे। साल 2009 में भाजपा के सुदर्शन भगत ने उन्हें हराकर लोहरदगा लोकसभा सीट छीन ली थी। साल 2014 में भी रामेश्वर उरांव को सुदर्शन भगत से हार का सामना करना पड़ा था।
  • वे अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष भी रहे हैं। इस लोकसभा चुनाव में उन्‍हें टिकट नहीं मिला। उनकी पत्‍नी रागिनी मिंज सिविल सर्जन रह चुकी हैं।

ये हैं पांच कार्यकारी अध्यक्ष

केशव महतो कमलेश, डॉ. इरफान अंसारी, राजेश ठाकुर, मानस सिन्हा और संजय पासवान। अब सुबोधकांत सहाय ने भी इस सूची पर मौन सहमति दे दी। सहाय पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. अजय कुमार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे और उन्होंने अपनी दावेदारी भी पेश की थी लेकिन उन्हें अंतिम समय में मना लिया गया।