#DeepikaPRBackfires : Deepika Padukone की बहुचर्चित फिल्‍म छपाक रिलीज हो गई। इस फिल्‍म का प्रदर्शन बहुत अच्‍छा नहीं रहा, जबकि इसे कई राज्‍यों में सरकार की ओर से टैक्‍स फ्री भी किया गया है। सभी जानते हैं कि यह फिल्‍म एसिड अटैक जैसी गंभीर समस्‍या पर आधारित है। फिल्‍म का विषय और दीपिका का अभिनय दोनों अच्‍छे होने के बावजूद फिल्‍म को लोगों ने पसंद नहीं किया। इसकी क्‍या वजह होगी। सीधा सा जवाब है, दीपिका पादुकोण की जेएनयू कंट्रोवर्सी। फिल्‍म रिलीज होने के तीन दिन पहले दीपिका जेएनयू में छात्रों का सपोर्ट करने पहुंची और विवादों में घिर गईं। सोशल मीडिया पर उनकी फिल्‍म का बॉयकाट शुरू हो गया। नतीजा सामने है। अच्‍छी खासी फिल्‍म को इस विवाद का खामियाजा भुगतना पड़ा। अब जब चूंकि फिल्‍म सामने आ चुकी है, सोशल मीडिया पर नया ट्रेंड चल रहा है, #DeepikaPRBackfires इसमें यूजर्स कह रहे हैं कि उन्‍हें फिल्‍म से हमदर्दी है लेकिन दीपिका ने सस्‍ती लोकप्रियता के चक्‍कर में एक संजीदा मसले के साथ नाइंसाफी कर दी है। लोगों की बातों से साफ लग रहा है कि वे इस फिल्‍म को हिट होते देखना चाहते थे लेकिन दीपिका की खुराफात इसे ले डूबी। ज़रा देखें लोग क्‍या कह रहे हैं।

पीयूष द्विवेदी भारत

तानाजी भारत में 3800 स्क्रीन पर रिलीज हुई और छपाक 1700 स्क्रीन पर। यानी कि तानाजी की स्क्रीन लगभग दुगुनी हैं।

तीन राज्यों में करमुक्त होने के बावजूद पहले दिन छपाक ने कमाए 4.70 करोड़ और तानाजी की कमाई रही 15.20 करोड़। यानी कि तानाजी ने कमाई लगभग तिगुनी की है।

आगे के संकेत ऐसे हैं कि शनिवार और रविवार के बीच तानाजी की कमाई में वृद्धि तय है जबकि छपाक के बहुत आगे जाने की उम्मीद नहीं लगती। उम्मीद है कि इस सप्ताहांत में तानाजी पचास करोड़ के आसपास होगी जबकि छपाक दस-बारह करोड़ के इर्द-गिर्द निपट जाएगी।

छपाक की निर्देशक मेघना गुलज़ार की पिछली फिल्म 'राज़ी' भी लगभग छपाक जितनी स्क्रीन्स पर ही रिलीज हुई थी और वो भी नायिका प्रधान फ़िल्म थी, लेकिन उसने पहले दिन तकरीबन साढ़े सात करोड़ की कमाई की थी। दीपिका, आलिया भट्ट से बड़ी स्टार हैं, इसलिए उनकी फिल्म से किसी भी तरह राज़ी से अधिक ओपनिंग की उम्मीद निर्माताओं को थी, लेकिन अब तो लागत निकल जाए तो भी गनीमत है।

दर्शकों से अलग आईएमडीबी से लेकर हर ऑनलाइन रेटिंग माध्यम पर तानाजी कहीं आगे है। कुछ वामपंथी वेबपोर्टलों को छोड़कर बाकी पूरी मीडिया ने भी तानाजी को छपाक से बढ़िया रेटिंग दी है।

छपाक एक जरूरी विषय पर बनी फिल्म है, लेकिन इसमें राजनीति को घुसाकर लाभ लेने के लालच ने इसका तो नुकसान किया ही है, लेकिन उससे कहीं अधिक दीपिका की छवि को भी इसका नुकसान हुआ है। देर-सबेर उन्हें ये बात समझ में आ जाएगी।

समझ में आ जाए तो ही बेहतर भी है, क्योंकि एक अच्छी अभिनेत्री को 'स्वरा भास्कर' बनकर बर्बाद होते हुए देखना कम से कम मेरे लिए सुखद नहीं होगा।

#DeepikaPRBackfires #Chapaak

LakshmiPratap Singh

एसिड अटैक सर्वाइवर्स के ऊपर दीपिका की फिल्म आ रही है छपाक। जिसके प्रमोशन के लिए फिल्म की पूरी टीम देश के एसिड सर्वाइवर्स से मिल रही है। क्या ये एक्टर/डायरेक्टर पेहले कभी मिले ? क्या इन्होने फिल्म की कमाई का कोई हिस्सा ऐसे पीड़ितों के लिए बने NGOs को दान करने की घोषणा की ? पिछ्ले साल जब ये फिल्म बन रही थी तब यूपी में जब एसिड अटैक विक्टिम्स के लखनऊ में बने कैफे #SherosHangout को योगी सरकार ने हटाने की कोशिश की तब उनका खयाल आया ?

हिन्दुओं की बात करने वाले नेताओं के लिए चुनाव एक इवेंट है। जिसकी प्रोमोशन-प्रचार के लिए वो मिलने आयेंगे। दंगे कराके शांति भंग कर देंगे। भाषणों में हिन्दुओं के भले बन ने की एक्तिंग करेंगे। क्या किसी नेता ने (अच्छे कौलेजों मे) फ्री शिक्षा, रोजगार, उधोगों में छूट की बात की? क्या कोई नेता चुनाव के बाद सुध लेने आया ?

एसिड सर्वाइवर्स को पता है कि एक दिन फोटो खिंचाने से दीपिका उनकी दोस्त नही हो गयी लेकिन जनता नेता से मिलकर एक दिन में उसे बाप मान लेती है। दोनों अभिनेता हैं, दोनों अपना स्वार्थ साधने आये हैं, और कल दोनों तुम्हें भूल जाएंगे।

Rajesh Ojha

आप "छपाक" देखना चाहते हैं? ज़रूर देखें। एक बार से मन न अघाये, 8-10 बार और देखें। मैं भी देखूंगा। लेकिन क्या उसे देखने मात्र से यह अमानवीय, भयावह कृत्य बंद हो जायेगा? यदि सचमुच ऐसी पाशविक वृत्ति, राक्षसी सोच और बीमार मानसिकता पर कुठाराघात करना है, तो उसके लिए जरूरी है कि हम सच्चरित्रता, सहृदयता, सदाशयता, सज्जनता, सद्गुणयुक्तता, सद्स्वभाव, सत्कार्य, सत्कर्म, सद्व्यवहार जैसे सद्गुणों को अपने व्यवहार और आचरण में उतारें, ताकि "छपाक" जैसी फिल्म बनाने की नौबत ही न आये।

Aarya Tiwari

#तानाजी Vs #छपाक

दीपिका की पिछली फ़िल्म का “पद्मावत” रिलीज़ होने के समय जितने ज्यादा विवाद और प्रोटेस्ट हुए थे...,उतना ही ज्यादा फ़िल्म को फायदा पहुँचा था..., और ये फ़िल्म 300Cr. कमाकर...,‘दीपिका’...,‘रणवीर’...,‘शाहिद कपूर’ और डायरेक्टर ‘संजय लीला भंसाली’ के ज़िंदगी की अबतक की सबसे बड़ी फ़िल्म बन गई...,

इस बार ‘छपाक’ के रिलीज़ होने के समय...,दीपिका और उनकी PR टीम ने सोचा कि...,फ़िल्म को भुनाने का अच्छा मौका है...,और दीपिका JNU जाकर लेफ्ट के छात्रों के साथ खड़ी हो गई...,

जैसा कि पहले से ही तय था...,फ़िल्म के विरोध में सोशल में ट्रेंड चलने लगें...,फिर फ़िल्म के सपोर्ट में भी ट्रेंड चला...,इन दोनों ही बातों से फ़िल्म की जमकर प्रोमोशन हुई...,

इतने से भी मन नहीं भरा...,तो पहले खुद ये अफवाह फैलाया गया कि...,फ़िल्म में मुस्लिम आरोपी को बदलकर हिन्दू आरोपी दिखाया गया है...,बाद में खुद ही इससे खंडन किया गया...,

ताकि विरोध करने वालों को मूर्ख साबित किया जा सके...,और आम पब्लिक फ़िल्म की ओर अट्रैक्ट हो...,

लेकिन इसबार इनसे गलती ये हो गई कि...,ये भूल गए कि सामने एक और फ़िल्म आ रही है...,रेगुलर ऑडियंस के पास दूसरा ऑप्शन भी है..., और वो भी कोई ऐसा वैसा ऑप्शन नहीं...,“तानाजी:-दी अनसंग वॉरियर” जैसी फ़िल्म जो कि ऑल टाइम बेस्ट फिल्मों में से एक होगी...,अगर छपाक के सामने ‘तानाजी’ न होती...,

तो इतने विरोध के बावजूद भी ‘छपाक’ बढ़िया कलेक्शन करती...,क्योंकि रेगुलर ऑडिएंश जो हर वीकेंड फिल्में देखने जाती है उसे किसी भी कॉन्ट्रोवर्सी से कोई फर्क नहीं पड़ता...,

यही ऑडिएंश पाकिस्तान में स्ट्राइक पर बेस्ड “उरी:- दी सर्जिकल स्ट्राइक” जैसी फिल्मों को भी हिट करवाती है...,और पाकिस्तान को मासूम दिखाने वाली “राज़ी” जैसी फिल्मों को भी...,यही लोग हिन्दू संस्कृति को महिमामंडन करनेवाली “बाहुबली” को भी हिट करवातें हैं...,और हिंदुओं पर आक्रमण करनेवाले आक्रांताओं को बहादुर दिखाने वाली “पद्मावत” को भी...,

यही लोग एंटीफेमिनिस्ट और सच्चे प्यार के लिए कमिटेड फ़िल्म “कबीर सिंह” को भी हिट करवातें हैं...,

और वन नाईट स्टैंड या मल्टीपल पार्टनर रखने जैसी चीजों को बढ़वा देने वाली घोर फेमिनिस्ट फ़िल्म “वीरे दी वेडिंग" को भी...,इन्हें सिर्फ मनोरंजन से मतलब होता है...,और जब लोगों के सामने मनोरंजन के के लिए “तानाजी” जैसी फ़िल्म ऑप्शन खुला हो...,तो लोग “तानाजी” जैसी फ़िल्म देखना ही पसन्द करेंगे...,

हाँ अगर दीपिका JNU न जाती...,और ये कॉन्ट्रोवर्सी न खड़ी होती...,तो ये फ़िल्म आराम से अच्छा अमाउंट कमाकर हिट साबित हो जाती...,क्योंकि इस फ़िल्म का सब्जेक्ट काफी सीरियस था...,और फ़िल्म के साथ लोगों की सिंपथी थी...,इसी वजह से लोग इसकी टेक्निकल खामियों को भी नजरअंदाज कर देते...,

फिलहाल पिछले दो दिनों की कलेक्शन की बात करें तो...,तानाजी फ़िल्म ने छपाक से तीन गुना ज़्यादा बिज़नेस किया है..., जिस तरह से तानाजी की माउथ पब्लिसिटी हो रही है...,आज का दिन सन्डे इस फ़िल्म के कलेक्शन को अलग ही दिशा में लेकर जाएगा...,और तीन दिन के वीकेंड का कलेक्शन 60Cr. के ऊपर होगा...,वहीं छपाक कोई खास ग्रोथ नहीं कर पाई...,फिलहाल इस फ़िल्म का वीकेंड कलेक्शन 20Cr. के अंदर ही सिमटती हुआ लग रहा है...,

Aarya Tiwari

Meena Shah Gupta

छपाक फिल्म के बीच में ही उठ कर आए सज्जन का चेहरा उतरा हुआ था ...

पूछने पर बोले : -

पूरे हाल में फ्री की बांटी हुई टिकट वाले फोकटिये बैठे थे

राजनैतिक नारेबाजी कर रहे थे ABVP मुर्दाबाद RSS मुर्दाबाद,,,,

कोई कैसे फिल्म देखे? क्या फायदा थिएटर जा के?

Seema Samridhi

छपाक को इसलिये देखना है,क्योंकि सभी को एक अपराध को रोकने की प्रेरणा मिलेगी। हीरोइन कौन है इस फिल्म की,इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि फिल्म में किस मुद्दे को उठाया गया है।और एक बहादुर बेटी लक्ष्मी के इरादों से भी कुछ सीखने को मिलेगा।

सैल्यूट लक्ष्मी जी को।

सीमासमृद्धि।

Kuldeep Sharma

अगर आप भारत के वीर साहसी योद्धाओं और महाराज शिववा के बीच पुराने जमाने मेंं कुछ पल जीना चाहते हो तो Tanhaji मूवी देखने जरूर जाओ, वाकई मेंं बेहतरीन फिल्म है... हालांकि कुछ मायूस इसलिए हुआ कि मैंने बचपन मेंं शिवाजी की कहानी कई बार सुनी और पढी है..उसमें शिवाजी के साथ कई युद्ध मेंं tanaji ने शिवाजी महाराज के ढाल के रूप मेंं युद्ध किया...लेकिन मूवी सिर्फ उनके अंतिम युद्ध पर आधारित है.. मूवी मेंं सभी कलाकारों ने अच्छी मेहनत की है... बाकी तारीफ आप खुद करेंगे...परिवार सहित जाईये तो सही .. खासकर.. लड़ैया बन रही बच्चों की पीढ़ी को जरूर जाना चाहिए , ताकि समझ आए कि रोटी, नौकरी, घर, परिवार से पहले अपनी मिट्टी, भगवा और स्वराज जरूरी है.. गढ़ आला, सिंह गेला....जय शिवाजी जय भवानी..🙏 💥💥🔥🔥

सुमन्त भदेसी

अपन "छपाक" नहीं देखेंगे..

क्योंकि यह किसी पाशविक व्यक्ति के पाशविक कृत्य के खिलाफ "नपुंसक सहानुभूति" की मांग करती है। अन्यायी का संहार नहीं करती।

अपन "ताना जी" जरूर देखेंगे..

क्योंकि यह "अधर्म" के खिलाफ "धर्मयुद्ध" की हुंकार भरती है। पुरुषार्थ जगाती है। वध करती है।

Mohit Datta Fcs

जेएनयू जाने के कारण दीपिका पादुकोण की फिल्म छपाक को काफी नुकसान हुआ है। रिलीज के पहले ही दिन पहले शो में पटना में फिल्म देखने के लिए मात्र सुबह में तीन लोग ही सिनेपॉलिस पहुंचे। फिल्म देखने वाले ने कहा कि यह अच्छी फिल्म है। लेकिन फिल्म देखने कम लोग पहुंच रहे हैं।

Aarya Tiwari

पहले ‘अजय देवगन’ की फ़िल्म...,

‘तानाजी:-दी अनसंग वारियर' की रिलीज़ डेट(10 जनवरी) सामने आई...,

जिन्हें पता नहीं उन्हें बता दूँ...,

‘तानाजी मालुसरे’ ‘छत्रपति शिवाजी महराज' के बेहद करीबी मित्र और उनके एक सूबेदार हुआ करते थे...,

और ये कहानी है...,

औरंगजेब द्वारा कब्जा किये गए...,कोंढाना किले को रात में चंद सैनिकों के साथ जाकर किस तरह किले को जीतकर उसपर भगवा फहराने की...,

महाराष्ट्र में तो बच्चा बच्चा सुबेदार तानाजी के बारे में जनता है...,लेकिन जरूरत है देश के बाकी हिस्सों में भी लोग तानाजी जैसे योद्धा के बारे में जानें...,जिन्हें इतिहास से कुछ खास जगह नहीं दी गई...,

और इस फ़िल्म के माध्यम से अजय देवगन का यही प्रयास है...,ऐसा अजय अपने कई इंटरव्यू में बोल चुकें हैं...,

ये फ़िल्म अजय देवगन के ज़िंदगी की सबसे खास फ़िल्म है...,क्योंकि ये उनका एक ड्रीम प्रोजेक्ट होने के साथ साथ सौंवी(100th) फ़िल्म भी हैं...,

अजय देवगन खुद इसके प्रोड्यूसर भी हैं...,

अजय देवगन चाहते थे...,

फ़िल्म की किसी दूसरी फ़िल्म से टक्कर न हो...,

इसीलिए उन्हें 10 जनवरी जैसी नॉन हॉलीडे रिलीज़ डेट चुनना पड़ा...,

लेकिन अभी कुछ दिन पहले अचानक से ‘दीपिका’ की फ़िल्म ‘छपाक' की रिलीज़ डेट सामने आ जाती है...,

जो कि 10 जनवरी ही होती है...,जिसकी प्रोड्यूसर खुद दीपिका है...,

देखा जाय तो...,

अगर अजय देवगन जैसा सीनियर एक्टर अपनी कोई इतनी बड़ी और खास फ़िल्म लेकर आ रहा हो तो...,

दूसरे फ़िल्ममेकर्स को खुद सामने से हट जाना चाहिए...,

लेकिन यहाँ ऐसा कुछ नहीं हुआ...,

हाँ अगर आमिर या शाहरुख इतनी बड़ी फिल्म लेकर आते...,तो इन फ़िल्ममेकर्स में अचानक से शिष्टाचार जग उठता और ये अपनी फ़िल्म को आमिर या शाहरुख की फ़िल्म के सामने नहीं आने देते...,

वैसे ‘तानाजी' और ‘छपाक’ की टारगेट ऑडियंस अलग अलग है...,

लेकिन दोनों फ़िल्म को रिलीज़ होने के बाद...,

बड़े बड़े क्रिटिक्स ‘छपाक' को बेहतरीन एक्टिंग और बोल्ड सब्जेक्ट का हवाला देते हुए अच्छी खासी रेटिंग्स देंगे...,

वहीं अजय देवगन की ‘तानाजी' को...,

हायपर एंड टॉक्सिक नेशनलिस्म और जिंगोइस्टिक फ़िल्म बताकर साइड कर देंगे...,

अब बात करते हैं...,

छपाक को बायकॉट करने की...,तो इसे कहीं से भी बायकॉट नहीं किया जा सकता...,

आजतक जितनी भी फिल्में बायकॉट की गई हैं...,सबने 300 करोड़ से ऊपर की कमाई हैं...,

उदाहरण:- पीके(340)...,दंगल(385) और पद्मावत(300)

दरअसल होता है ये है कि...,

हर वीकेंड थिएटर जानेवाली एक फिक्स्ड ऑडिएंस होती है...,उन्हें फर्क नहीं पड़ता कौन सी फ़िल्म लगी है...,कौन से एक्टर ने क्या स्टेटमैंट दिया है...,उन्हें सिर्फ फ़िल्म देखने से मतलब होता है...,

और पता नहीं ये बायकॉट का ट्रेंड चलाने वाले थिएटर तक कभी जाते भी हैं या नहीं...,

ऊपर से फ़िल्म प्रोमोशन अलग से कर देते हैं...,वो भी फ्री में...,

छपाक को बायकॉट करने से अच्छा है...,

‘तानाजी’ जैसी फ़िल्म को प्रमोट करो...,अगर आपके ग्रुप में या कॉन्टेक्ट में कोई फ़िल्म देखने का प्लान करे...,

तो उसके सामने ‘तानाजी' फिल्म का जिक्र करो...,

जो फ़िल्म देखनी ही नहीं...,

उसका नाम बायकॉट वगैरह जैसे ट्रेंड में लाकर कहीं भी जिक्र ही मत करो...,🙏

Sanjay Sinha

कई और लक्ष्मी

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लक्ष्मी अग्रवाल की फिल्म 'छपाक' पर्दे पर लग चुकी है। जिस लक्ष्मी की कहानी रुपहले पर्दे तालियां बटोरेगी, उस लक्ष्मी की कहानी आप जानते हैं। मशहूर फिल्म अदाकारा दीपिका पादुकोण फिल्म में हैं। जो लक्ष्मी की कहानी नहीं जानते, वो अब उसकी कहानी जान जाएंगे। पर संजय सिन्हा आज आपको उस लक्ष्मी की कहानी सुनाने जा रहे हैं, जिसकी कहानी कभी किसी अखबार के छोटे-से कोने तक नहीं पहुंच पाई। उस लक्ष्मी की कहानी सुनाने जा रहे हैं, जिससे वो कुछ साल पहले पटना में मिल कर आए थे। मुझे याद है मैंने ये कहानी आपको पहले सुनाई है। पर आज मुझे लग रहा है कि आप रुपहले पर्दे पर किसी एक लक्ष्मी की कहानी ही क्यों देखें?

आप उस लक्ष्मी की कहानी भी संजय सिन्हा की निगाहों से देखिए, जो चेहरे पर तेजाब फेंके जाने के बाद ठीक से इलाज तक के लिए तरस कर रह गई। और फिर... नहीं। बीच से कोई कहानी शुरू नहीं होती। आप मेरे साथ उस सफर पर चलिए, जहां मैं आपको उस लक्ष्मी से मिलाता हूं, जिसकी कहानी अनसुनी रह गई। अनदेखी रह गई। बेशक संजय सिन्हा ने कहानी सुनाई थी, पर आज आप इसे मेरा अपराधबोध ही मानिए कि मैं आपको एक बार फिर वही कहानी सुना रहा हूं, जिसकी टीस मेरे मन के किसी कोने में हमेशा दबी रहेगी। इस कहानी में खास बात ये है कि मैं अपनी लक्ष्मी से मिला तो एक ही बार लेकिन कहानी मैने लिखी दो बार।

मैं बाद वाली कहानी पहले सुनाऊंगा, पहले वाली बाद में। उससे मैं पटना में मिला था अपनी किताब के विमोचन के सिलसिले में, तब मैंने उसकी कहानी सुनाई थी। पर दूसरी बार मैंने फिर कहानी सुनाई पटना के परिजन मुकेश हिसारिया के एक फोन के बाद। सुनिए दूसरी कहानी पहले। मैं कोशिश करुंगा कि पहले की कहानी इसके साथ ही यानी कल सुना दूं। क्योंकि अगले दिन की कहानी पहले से तय नहीं होती, इसलिए मैं खुद याद रखने की ज़िम्मेदारी ले रहा हूं। फिर भी किसी वजह से भूल जाऊं तो माफी का हकदार रहूंगा। नदी के किनारे एक पेड़ था। उस पर एक बंदर रहता था। नदी में एक मगरमच्छ रहता था। बंदर रोज़ पेड़ से जामुन तोड़ कर मगरमच्छ को खिलाया करता था। मीठे-मीठे जामुन खा कर मगर बहुत खुश होता था।

एक दिन मगर कुछ जामुन लेकर अपनी पत्नी के पास गया। मगर की पत्नी ने जामुन चखा। इतना मीठा जामुन?उसने मगर से पूछा कि कहां से लाए? मगर ने कहा कि नदी के किनारे जामुन के पेड़ पर एक बंदर रहता है। वही खिलाता है। मगरमच्छनी के मुंह से निकला, क्या वो रोज़ जामुन खाता है? मगर ने कहा, “हां, वो तो जामुन के पेड़ पर ही रहता है। उसे क्या कमी है?” मगरमच्छनी के मुंह से लार टपकने लगी। आह, जब जामुन इतना मीठा है तो इसे रोज़ खाने वाले का कलेजा कितना मीठा होगा! आगे की कहानी आपको पता है। आपको पता है कि मगरमच्छनी ने कैसे मगर को उकसाया कि वो किसी तरह जाकर बंदर को यहां लेकर आए, वो उसका कलेजा खाएगी।

आपको ये भी पता है कि कैसे मगर बंदर को अपनी बातों में फंसा कर नदी के बीच तक ले आया था, फिर उसने बंदर को सच बता दिया था कि मगरमच्छनी को उसका कलेजा खाना है। बंदर ने ये कह कर अपनी जान बचाई थी कि कलेजा तो पेड़ पर है। पहले कहते तो साथ ले आता। मीठे जामुन के पेड़ पर रहने वाला बंदर उस दिन मगर से बच गया था। पर मीठे लड्डुओं के शहर ‘मनेर’ में रहने वाली 'चंचल' मगरों से नहीं बच पाई। पटना से पचास किलोमीटर दूर एक शहर है-आरा। पटना से आरा जाते हुए बीच में एक छोटी-सी जगह पर हमारी गाड़ी रुकती थी। पिताजी मुझे बताते थे कि यहां के लड्डू दुनिया भर में मशहूर हैं। वहां लड्डू की कई दुकानें सड़क के किनारे थीं। हम एक दुकान में घुसते।

वहां काउंटर पर बहुत मोटा आदमी बैठा होता था। पिताजी को देखते ही दोनों हाथ जोड़ कर उन्हें प्रणाम करता। पिताजी जब तक कुर्सी पर बैठते, एक लड़का प्लेट में चार-छह लड्डू लेकर आता। हम उन लड्डुओं को खाते। पीले-पीले लड्डू मुंह में जाते ही घुल जाते। फिर पिताजी दो-चार डिब्बे पैक कराते कि इन्हें जमुना चाचा के घर देंगे, मिथिलेश मामा के घर देंगे। पिताजी मन ही मन तय कर चुके होते थे कि कितने लोगों के घर जाना है। लड्डुओं की पैकिंग चलती रहती, मैं मन ही मन सोचता रहता कि जब यहां के लड्डू इतने अच्छे हैं, तो यहां रहने वाले लोग कितने अच्छे होंगे। मैं ‘मनेर’ कभी नहीं घूमा। लेकिन उन लड्डुओं की वज़ह से ‘मनेर’ मेरे मन में एक मीठे से अहसास के रूप में बस गया था। बहुत साल बीत गए।

मैं पटना से भोपाल गया और भोपाल से दिल्ली चला आया। पर मनेर की मिठास जस की तस बची रही। अक्तूबर 2012 की बात है, मेरे पास ख़बर आई कि ‘मनेर’ में दो बहनों पर किसी ने तेज़ाब फेंक कर उन्हें जला दिया है। मैं जानता हूं कि दिल्ली के अखबारों और न्यूज़ चैनलों के लिए ऐसी खबरें हेड लाइन नहीं होतीं। दो लड़कियां छत पर सो रही थीं और किसी ने उनके चेहरे पर तेज़ाब फेंक दिया तो इसमें खबर क्या है? पर मेरे लिए वो खबर थी। मेरे लिए इसलिए खबर थी, क्योंकि वो लड़कियां मेरे लड्डुओं के शहर की थीं। जैसे ही मैंने मनेर पढ़ा, मैंने विस्तार से खबर की पड़ताल की।

दो बहनें, चंचल और सोनम छत पर सो रही थीं। अचानक उन्हें लगा कि उनका चेहरा पिघल रहा है। उन्हें लगा कि किसी ने खौलता लोहा उन पर उड़ेल दिया है। उनकी आंखें खुलीं, चार लड़के सामने खड़े थे और दोनों बहनों पर तेज़ाब डालते हुए हंस रहे थे। “बहुत गुमान है न अपनी सुंदरता पर, तो ये लो तुम्हारी सुंदरता सदा के लिए खत्म कर रहा हूं।” चारों चंचल और सोनम पर तेज़ाब छिड़क कर भाग गए। दोनों बहुत चीखीं, बहुत चिल्लाईं। घर के लोग छत पर आए तो बेटियों की ये हालत देख कर सदमें में चले गए। मुझे याद है, मैं न्यूज़ रूम में बैठा था। मेरे पास ख़बर आई थी कि पटना के पास ‘मनेर’ में दो बहनों पर कुछ बदमाशों ने तेज़ाब फेंक दिया।

ओह! मीठे लड्डुओं के शहर में मीठे-मीठे लोगों पर मगरमच्छों की नज़र लग गई? मैं विचलित हुआ। पर संजय सिन्हा जैसे किसी एक पत्रकार के विचलित होने से भला क्या फर्क पड़ता है? बहुत साल बीत गए। आपने शायद चंचल की कहानी सुनी हो। आपने सुना हो कि उन दोनों बहनों का चेहरा पूरी तरह जल गया था। दोनों का चेहरा कोई देख ही नहीं सकता था। देखने वाले अपनी आंखें बंद कर लेते थे। आख़िर में उन बहनों ने अपने चेहरे को ही बंद कर लिया था, ताकि समाज को तकलीफ न हो। पटना से अपने परिजन मुकेश हिसारिया ने मुझे अपने एक कार्यक्रम में निमंत्रित किया था। उन्होंने बताया कि तेज़ाब पीड़ित लड़कियों से वो मुझे मिलवाना चाहते हैं। मैं पटना गया था।

मुझे अपनी एक किताब का विमोचन करवाना था। वहां मैं पहली बार कई तेज़ाब पीड़ित लड़कियों से मिला। उन्हीं में से एक थी, मनेर की चंचल। मैं सोच कर गया था कि किसी वीआईपी से अपनी किताब का विमोचन करवाऊंगा। पर वहां इन तेज़ाब पीड़ितों से मिलने के बाद मुझे लगा कि मेरी किताब ‘उम्मीद’ का विमोचन इन्हीं के हाथों हो तो कितना अच्छा होगा। मैंने मुकेश हिसारिया जी से बात की। उन्होंने उन लड़कियों से बात की और फिर मेरी किताब का विमोचन तेज़ाब पीड़ित लड़कियों के हाथ हुआ। अब आप सोच रहे होंगे कि संजय सिन्हा जामुन, बंदर, मगरमच्छ की कहानी सुनाते-सुनाते ये कहां तेज़ाब पीड़ितों की कहानी सुनाने लगे।

मैं आपसे अपने दुख को साझा करना चाहता हूं। साल भर बाद मुकेश जी ने मेरे पास संदेश भेजा कि मनेर की चंचल ज़िंदगी से लड़ती हुई दो दिन पहले इस संसार से चली गई। मैंने जब ये ख़बर सुनी, मेरा दिल बैठ गया। मीठे जामुन के पेड़ पर रहने वाला बंदर तो मगरमच्छ से बच निकला था, पर मीठे लड्डुओं के शहर में रहने वाली चंचल मगरमच्छों से नहीं बची। एक बंदर ने मगरमच्छ के धोखे की कहानी दुनिया को सुना दी। सभी ने मगरमच्छों को जामुन खिलाना बंद कर दिया। चंचल ने चेहरे पर तेज़ाब फेंकने वाले मगरमच्छों की कहानी घूम-घूम कर दुनिया को सुनाई, पर अब भी हमारे समाज में बहुत से लोग हैं, जो उन मगरमच्छों को लड्डू खिला कर पाल रहे हैं। तुम जहां भी हो चंचल, तुम्हें संजय सिन्हा का सलाम। तुम जहां भी रहो तेज़ाब के मगरमच्छों, लानत है तुम पर। एक दिन तुम्हें अपने किए का हिसाब देना ही होगा। यहां न सही, वहां सही। पर देना ही होगा। कोई अपने कर्मों से न बचा है, न बचेगा।

#SanjaySinha #ssfbFamily

Sanjay Sinha

उम्मीद और ज़िंदगी

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मैंने वादा किया था कि मैं तेज़ाब की एक और कहानी आपको सुनाऊंगा। कहानी मैंने पहले सुनाई है लेकिन ‘छपाक’ फिल्म से ये मामला फिर ताज़ा हो गया है। कई कहानियां, कई घटनाएं मन पर गहरा असर छोड़ती हैं, ज़िंदगी भर के लिए छोड़ती हैं। शायद इसी वजह से मैं उस लड़की की कहानी आपको फिर से सुना रहा हूं, जिसे बार-बार सुनने के बाद भी मन शांत नहीं होता।

मेरी आज की कहानी पढ़ने से पहले आप उस तस्वीर को देखिएगा, जिसमें लड़की ने अपने मुंह पर नकाब बांध रखा है।

मैं ज्यादा लंबी चौड़ी भूमिका नहीं बनाना चाहता, इसलिए सीधे-सीधे आपको बता देता हूं कि लड़की का नाम ज्योति है और ये बिहार में मोतिहारी की रहने वाली है। इस मासूम बच्ची ने अपना चेहरा ढक रखा है, क्योंकि कुछ साल पहले किसी ने इसके चेहरे पर तेज़ाब फेंक दिया था।

क्या विडंबना है?

जिसे अपना चेहरा छिपाना चाहिए, वो खुलेआम घूमता है। जिसे खुलेआम घूमना चाहिए, उसने चेहरा छिपा रखा है। मतलब कसूर करने वाला बेख़ौफ है, बेकसूर ख़ौफजदा है।फिल्म छपाक की नायिका का यही फैसला उसे जीने के लिए उकसाता है कि वो खुलेआम घूमेगी। उसे नहीं छिपना, छिपना उसे है जिसने उसका ये हाल किया है।

ज्योति एक छोटी बच्ची है। आप शायद ज्योति को नहीं जानते हों, पर मैं जानता हूं। अपनी किताब ‘ज़िंदगी’ के विमोचन पर पटना आया था। यहां मेरी मुलाकात कई ऐसी लड़कियों से हुई थी, जिनके चेहरों पर कुछ मनचलों ने तेजाब फेंक दिया था। तेज़ाब क्यों फेंक दिया था, यह सुन कर तो आप शर्म से ही गड़ जाएंगे। अधिकतर मामलों में उन मनचलों की तरफ से कहे गए ‘आई लव यू’ का जवाब नहीं देने के कारण। उस कार्यक्रम में मैं सोनाली मुखर्जी से मिला था, जिनका पूरा चेहरा तेज़ाब से झुलस गया है।

तब सोनाली ने कहा था कि वैसे तो आदमी ज़िंदगी में एक बार ही मरता है, पर वो रोज़ तिल-तिल कर मरती है। उसने कहा था कि इस पीड़ा को शब्दों में बयां करना बहुत मुश्किल है। सोनाली के साथ ही मोतिहारी की ज्योति भी थी। साथ ही मनेर की चंचल और सोनम भी आई थीं, जिनके चेहरे तेज़ाब से झुलस गए थे। सबके चेहरों पर नकाब था। क्या आप जानते हैं कि ये लड़कियां अपने चेहरे को ढक कर क्यों रखती हैं? क्योंकि वो नहीं चाहतीं कि आप उनके जले हुए चेहरे को देख पाएं। क्योंकि वो नहीं चाहतीं कि आप उन्हें देख कर उनसे नफरत करने लगें।

क्योंकि आप सिर्फ उतना ही देखें, जितना देखना चाहते हैं। दरअसल किसी के चेहरे पर तेज़ाब फेंका ही जाता है, उसकी सुंदरता को मिटा देने के लिए। फेंकने वाला सिर्फ तन की सुंदरता पर हमला नहीं करता है, वो उसके सपनों पर भी हमला करता है। इन बच्चियों से मिल कर मैं अकेले में बहुत देर सोचता रहा। इन लड़कियों के लिए जो कुछ किया जा सकता था, वो सब किया गया। बिहार सरकार से इन्हें आर्थिक मदद दिलवाई गई। पर क्या पैसे से सबकुछ संभव है? खैर, मैंने सोचा था कि अगले साल जो किताब आएगी, उसे अगर संभव हुआ तो मैं पटना लेकर आऊंगा और जिन दस हज़ार लोगों के सामने बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने ‘ज़िंदगी’ का विमोचन किया है, उन्हीं के सामने किसी एक बहन से अपनी नई किताब का विमोचन कराऊंगा। मुझे ‘उम्मीद’ थी कि मैं ऐसा कर पाऊंगा।

उस दिन मेरी उम्मीदों को पंख दिया मोतिहारी से पटना आकर ज्योति ने। वही करीब दस हज़ार लोगों की मौजूदगी में ‘उम्मीद’ का विमोचन हुआ। ढेर सारे अफसर, मंत्री, नेता और अभिनेता यहां आए थे, पर ‘उम्मीद’ का विमोचन एक बहन ने किया। उस बहन ने, जिससे मैं पिछले साल मिल कर गया था। मुझ जैसे किसी पत्रकार के लिए बहुत आसान होता है, नेता और अभिनेता के हाथों किताब का विमोचन कराना, सुर्खियों में आ जाना। पर जो खुशी मुझे उस दिन मिली, अपनी एक ऐसी बहन के हाथों किताब का विमोचन कराते हुए, जिसने इतने बड़े हादसे के बाद भी ज़िंदगी से ‘उम्मीद’ नहीं छोड़ी और अपने हर दर्द का उसने हिम्मत से सामना किया, वो पहले नहीं मिली थी। पटना में जो हुआ, वो मेरी ‘उम्मीद’ से कहीं बढ़ कर हुआ। आप सब भी अपनी ‘उम्मीद’ की ज्योति जलाए रखिएगा। जहां उम्‌मीद है, वहीं ज़िंदगी है।

देवेन्द्र सिकरवार

बहिष्कार व प्रचार? भारत के नवराष्ट्रवादियों को अभी यह शऊर तक नहीं आया कि किसका बहिष्कार कब किया जाना चाहिये और कैसे किया जाना चाहिये। वर्तमान में दीपिका पादुकोण की फ़िल्म के विषय में भी यही भ्रम की स्थिति निर्मित हो गई है। एक वर्ग इस फ़िल्म का बहिष्कार कर रहा है दूसरा वर्ग इसकी तुलना पद्मावती से करते हुये इसे इग्नोर करने की सलाह दे रहा है। वास्तव में दोंनों पक्ष ही बिना सोचे समझे प्रतिक्रिया देते हैं इसलिये विपरीत परिणाम पाते हैं जबकि वामपंथी संख्या में नगण्य होते हुये भी 'तूफान' खड़ा कर ले जाते हैं। वस्तुतः बहिष्कार अभियान से पूर्व जान लेना चाहिये कि बहिष्कार किसका है और उसका मूल उद्देश्य क्या है?

पद्मावती प्रकरण में बहिष्कार मूलतः कथानक का था और बहिष्कार का उद्देश्य सरकार और हिंदू जनता का जागरण था। उद्देश्य पूर्ण हुआ परंतु साइड इफैक्ट के रूप में कथानक के प्रति दुर्दमनीय उत्सुकता भी जाग गई अतः फ़िल्म सुपरहिट चली गई। जबकि इधर 'छपाक' का बहिष्कार दीपिका पादुकोण के वामपंथी छात्रों के साथ खड़े होने को लेकर पक्षपाती और राष्ट्रवाद के प्रति द्वेषी व्यवहार को लेकर है जिसमें फ़िल्म के प्रति कोई उत्सुकता नहीं जागने वाली और फ़िल्म को रिलीज होने से पूर्व कुछ घाटा तो अभी से भुगतना ही पड़ा है।

लेकिन अब आरोपी 'नदीम' को सिनेमा में 'राजेश' कर देने के आरोप और निर्मात्री मेघना गुलजार द्वरा खलनायक पात्र को पुनः मुस्लिम के रूप में दर्शाने के दावे बाद लोगों के बहिष्कार का केंद्र दीपिका से हटकर पुनः फ़िल्म का कथानक हो गया है। अब बदली परिस्थिति में फ़िल्म शुरूआती घाटे को कितना रिकवर कर पायेगी ये देखना दिलचस्प होगा।

बहरहाल राष्ट्रवादियों ने जगह जगह कुँए खोदने की वृत्ति ने बहिष्कार का केंद्र दीपिका को हटाकर फिल्मी कथानक व पात्रों को बना दिया है जो फ़िल्म के लिये आर्थिक रूप से और राष्ट्रवादियों के लिये हिंदूजागृति के नजरिये से फायदेमंद साबित होगी। वस्तुतः मल्टीप्लैक्स सिस्टम के कारण घाटा तो आजकल कम ही फिल्मों को होता है लेकिन अगर दीपिका पादुकोण पर विरोध संकेंद्रित रहता तो बॉलीवुडिया भांडों के मन में एक खौफ पैदा होता।

Posted By: Navodit Saktawat

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