Mohd Rafi : महानतम गायक मोहम्‍मद रफी के लाजवाब गीतों के नायाब खजाने में एक गीत ऐसा है जो उन्‍होंने 102 डिग्री बुखार में गाया था। गीत भी अपने आप में बेजोड़ है। बहुत से श्रोताओं और रफी साहब के दीवानों को शायद यह बात पता ना हो कि उन्‍होंने तपते बुखार में यह गीत गाया। यह सवाल उठना स्‍वाभाविक है कि आखिर इसकी क्‍या वजह थी। आइये आपको पूरा वाकया बताते हैं। सबसे पहले जान लीजिये यह गीत कौन सा है। यह गीत है, 'जाने क्‍या ढूंढती रहती हैं ये आंखें मुझमें, राख के ढेर में शोला है ना चिंगारी है'। यह वर्ष 1961 में आई फिल्‍म 'शोला और शबनम' का गीत है, जिसे कैफी आज़मी ने लिखा और संगीत खय्याम ने दिया। पर्दे पर इसे धर्मेंद्र पर फिल्‍माया गया। यह धर्मेंद्र की शुरुआती फिल्‍मों में से एक है।

हिंदी सिनेमा के उस दौर में संगीत का क्षेत्र बहुत व्‍यापक था और एक-एक गीत पर महीनों तक काम चलता था। गीतकार जब गीत के बोल लिखते तो वह कई बार एडिट किए जाने के बाद फाइनल होता। फिल्‍म निर्माण का एक बड़ा समय संगीत में खर्च होता था। एक गीत के लिए गायकों का रिहर्सल सेशन कई दिनों तक चलता और जब एक-एक साजिंदे का म्‍यूजिकल नोट परफेक्‍ट हो जाता तक रिकॉर्डिंग का दिन तय किया जाता था। यानी रिकॉर्डिंग एक बड़ा इवेंट होता था। इस गीत की रिकॉर्डिंग जिस दिन तय हुई उस दिन रफी साहब को तेज बुखार था। 102 डिग्री बुखार में सामान्‍य व्‍यक्ति गाना तो दूर, ठीक से बोल भी नहीं सकता।

संगीतकार खय्याम को जब यह पता चला तो उन्‍होंने रफी साहब से कहा कि रिकॉर्डिंग को आज कैंसल कर देते हैं। लेकिन रफी साहब इस बात के लिए राजी नहीं हुए। उनका मानना था कि रिकॉर्डिंग कैंसल हो जाने से फिल्‍म के प्रोड्यूसर का समय और पैसे का नुकसान होता है। सभी साजिंदों के मेहनताने का नुकसान होता है। वे नहीं चाहते थे कि उनकी वजह से इतने सारे लोगों को नुकसान उठाना पड़े।

आखिर तेज बुखार में वे रिकॉर्डिंग के लिए आए और साढ़े तीन मिनट का पूरा गीत रिकॉर्ड किया। इस गीत को सुनने पर एक प्रतिशत भी नहीं लगता कि यह खराब तबीयत से गाया गया गीत है, बल्कि यह विषय और फिल्‍म के सीन की सिचुऐशन के हिसाब से परफेक्‍ट बन पड़ा है। रफी साहब ने स्‍वयं कष्‍ट उठाकर कई लोगों को नुकसान से बचा लिया, यह बात आज भी सराही जाती है।

Lyric पूरा गीत यहां देखें

जाने क्या ढूँढती रहती हैं ये आँखें मुझमें

राख के ढेर में शोला है न चिंगारी है

अब न वो प्यार न उसकी यादें बाकी

आग यूँ दिल में लगी कुछ न रहा कुछ न बचा

जिसकी तस्वीर निगाहों में लिये बैठा हो

मैं वो दिलदार नहीं उसकी हूँ खामोश चिता

ज़िंदगी हँस के न गुज़रती तो बहुत अच्छा था

खैर हँस के न सही रो के गुज़र जायेगी

राख बरबाद मुहब्बत की बचा रखी हैं

बार-बार इसको जो छेड़ा तो बिखर जायेगी

आरज़ू जुर्म वफ़ा जुर्म तमन्ना है गुनाह

ये वो दुनिया है जहाँ प्यार नहीं हो सकता

कैसे बाज़ार का दस्तूर तुम्हें समझाऊँ

बिक गया जो वो खरीदार नहीं हो सकता ...

एक बार ध्‍यान से सुनिये यह क्‍लासिक गीत

Posted By: Navodit Saktawat

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