8 दिसंबर, आज जॉन लेनन की 39 वीं पुण्‍यतिथि पर विशेष

नवोदित सक्‍तावत। The Beatles के म्‍यूजीशियन जॉन लेनन (John Lennon) की आज 39 वीं पुण्‍यतिथि है। लेनन का कृतित्व और व्यक्तित्व विरोधाभासी नहीं रहा, एक जैसा ही रहा। कथनी व करनी में अंतर नहीं रहा। उनके मिजाज के बारे में तो सभी जानते हैं लेकिन आइये उनके जीवन के कुछ पहलुओं को हम देखें जिनसे हमें लेनन की जिंदगी की कुछ झलक मिलेगी। बचपन में जॉन लेनन की मां तब तक आदर्श पारिवारिक गृहिणी रही, जब तक बाहर रहने वाले उसके पति उसे खर्चे के चेक भेजते रहे। जब चेक आना बंद हो गए, इस महिला ने किसी दूसरे आदमी से संबंध बना लिए, तो इस व्यक्ति ने समाज और संबंधों का असली चेहरा उस बचपन में ही देख लिया था। उसने पहचान लिया था समाज का नकलीपन। उसने जान लिया था रिश्तों का सच। उसने जीवन भर समाज की विसंगतियों को स्वयं पर हावी नहीं होने दिया। उसने जीवन जीने में विश्वास रखा, जीवन ढोने में नहीं। वह मुंहफट था लेकिन बदतमीज नहीं। उसने सच को सच बोला, वह सच बोलने में कभी विचलित नहीं होता था। वह अमीरों का अपमान करने से नहीं चूकता था क्योंकि वह उस दौर के सामंती ब्रिटिश अमीरों की बेहूदगी से वाफिक था। वह अपनी कला से केवल छदम सौंदर्य की बातें नहीं करता था।

उसने अपनी कला को अपने दर्शन के संप्रेषण का माध्यम बनाया। उसने जीवन की बातें कीं, कल्पनाशीलता को आयाम दिये। उसने गीत लिखे, संगीत रचा, शब्दों का आवाज दी। वह कलाकार भी था, चिंतक भी, विचारक भी, प्रेमी भी और कदाचित हिंसक भी।

वह हद दर्जे का मसखरा था, विदूषक था लेकिन गंभीरता को ऐसे ओढ लेता मानो यकीन करना मुश्किल होता कि वह कभी हंस भी सकता है। यारों का यार था, यारों का लीडर भी और यारों से अलग हुआ तो यारों का जख्म भी बन गया! उसके पास गजब का हास्यबोध था, वह गजब का हाजिरजवाब और वाचाल था।

हसंने हंसाने के अदभुत मादृे से इतर जब वह आत्मविश्वास से कहता कि मैं आपको नई दृष्टि दिखाता हूं, तो वह आदमी कम, पहेली अधिक मालूम पडने लगता। उसे समझना कठिन था, वह पकड में नहीं आ पाया।

उसके जीवन की तरह, उसकी मौत भी अविश्वनीय ढंग से हुई जब उसका एक आशिक ही उसका कातिल बनकर सामने आया। जीवन के पूर्व़ाद्ध में उसने जिस समाज की खबर ली, उत्तरार्ध में उसी समाज को बहुत लौटाना भी शुरू किया।

वह विशुद्ध नैसर्गिक आदमी था। वह चीजों को उनके वास्तविक रूप में देखना—दिखाने का पक्षधर था। कृत्रिमता से उनका नाता नहीं जुड सका।

लोगों के जीवन में आने वाले घटनाक्रमों पर उसने अपनी कला के जरिये अपना गूढ फलसफा दिया। उसकी कल्पनाशीलता अत्यंत सघन थी। वह जितना फंतासी था, उतना ही यर्थाथवादी भी। जब वह समाज की विद्रूपता से उकता गया तो उसने एक दिवास्वप्न देखा।

उसने गुजारिश की कि क्यों ना हम एक अलग, नया समाज गढें? उसने कल्पना की ऐसे समाज की जहां ना लालच हो, ना जलन, ना दुर्भावना, ना भूख, ना गरीबी, ना राजनीति, ना उत्कृष्टता, ना हीनता, ना स्वर्ग और ना ही नर्क! उसने पूछा कि कितना अच्छा हो कि ये संसार एक साथ, एक लय में हो जाए!

उसने मानवता की बात की, तथाकथित सभ्यता की नहीं। उसने यह भी कहा कि यह मेरे मन की बात नहीं, ये सबके मन की बात है। उसने प्रबल आत्मविश्वास से कहा कि भले ही आप मुझे स्वप्नदृष्टा कह लें, लेकिन ये सपना देखने वाला मैं अकेला नहीं हूं।

यह शख्स जॉन लेनन था!

Posted By: Navodit Saktawat

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