Dabangg 3 सिर्फ और सिर्फ सलमान खान के लिए देख सकते हैं, तो ही जाइए। अगर आप Salman Khan को पौने तीन घंटे झेल सकते हैं तो ही इतना महंगा टिकट खरीदें वर्ना यह तो अभी तक आई सारी 'दबंग' फिल्मों में सबसे कमजोर हैं। इस फिल्म से जो ट्रेंड मिलता है वो गिरते स्तर की ओर ईशारा करता है। सबसे बढ़िया 'दबंग' थी, फिर आई 'दबंग 2' कमजोर थी। अब Dabangg 3 बेहद बुरी है। इस फिल्म में ना कहानी है, ना स्क्रिप्ट... 70 के दशक के किस्से हैं जिनका आज कोई लेना-देना नहीं है। इन्हें चुलबुल पांडे तक ही सीमित रहने देना चाहिए।

इस बार एक पुराना सिरा पकड़कर कहानी गढ़ी गई है। इस बार पंगा निजी है, आम जनता इससे दूर है और सिर्फ चुलबुल पांडे ही बाली सिंह से उलझ रहे हैं। इस फिल्म में जो देखने लायक है वो है बाली सिंह यानी किच्चा सुदीप। सुदीप एक्टिंग भी करते हैं और एक अदा भी उनके पास है। वो हर सीन में सलमान खान पर भारी हैं। लेकिन उनका अच्छा होना इस फिल्म को पसंद करने के लिए काफी नहीं है।

फिल्म में नकलीपन बुरी तरह हावी है। इस बार तो सलमान खान के पिता भी नकली हैं, यानी विनोद खन्ना नहीं हैं। निर्देशक ने इतनी जहमत नहीं की कि एक ढंग का कलाकार ढूंढ लेते। सिर्फ शक्ल मिलती है इसलिए विनोद खन्ना के भाई को ले लिया गया, उनसे दो सीन भी ढंग से नहीं हो पाए हैं। ऐसे एक नहीं कई कलाकार इस फिल्म में हैं। सलमान खान ने कई बेरोजगारों को काम दिया है।

सई मांजरेकर की यह पहली फिल्म है, और वो ही सलमान खान का पहला प्यार हैं। Dabangg 3 में हर राज ऐसे खोला गया है जैसे किसी महान हस्ती का जीवनचित्र पेश किया जा रहा हो... वो यहां आए थे... इसी वॉश बेसिन में मुंह धोया था... इसी गुसलखाने में वो नहाए थे। अब इन्हें कौन बताए कि 'चुलबुल पांडे' सिर्फ और सिर्फ सलमान खान के लिए एक महान किरदार है... हम जैसों को तो सिर्फ मनोरंजन से मतलब है फिर वो चुलबुल करे या राधे।और वो मनोरंजन यहां गायब है

यहां है तो केवल तीन दर्जन बुरे कलाकार, आधा दर्जन कमजोर गाने और दो दर्जन बुरे सीन। सलमान खान से ज्यादा मोह ना हो तो 'दबंग 3' की ओर रुख नहीं किया जाना चाहिए। पिछले हफ्ते रिलीज हुई 'मर्दानी 2' अगर नहीं देखी हो तो वो ही देख लें।

- सुदीप मिश्रा

Posted By: Sudeep mishra

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