बायोपिक की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए दर्शकों के सामने आई है रितिक रोशन (Hrithik Roshan) और मृणाल ठाकुर (Mrunal Thakur) की बहुचर्चित फिल्म Super 30। यह बिहार के ऐसे द्रोणाचार्य की कहानी है जिसने अर्जुन को नहीं एकलव्य को महान बनाया। बिहार के जीनियस गणितज्ञ और शिक्षक आनंद कुमार, जिन्होंने अपना खुशहाल करियर छोड़कर, अपने प्यार को कुर्बान कर के 30 ऐसे बच्चों को आईआईटी के लिए पढ़ाया जो बिल्कुल ही साधन विहीन थे। यह फिल्म उनकी कहानी कहती है।

70 के दशक में अमिताभ बच्चन (Amitabh Bachchan) के उदय के साथ एंग्री यंग मैन का प्रादुर्भाव हुआ । एंग्री यंग मैन ने गरीब होते हुए भी अमीरों को धूल चटाई। बॉलीवुड के लिए यह फार्मूला हमेशा से ही हिट रहा है। अमीर जितना पिटता जाएगा उतना ही बॉक्स ऑफिस पर गल्ला भरता जाएगा। और यही फॉर्मूला 'सुपर 30' को एक बड़ी सफल फिल्म जरूर बनाएगा।

निर्देशक विकास बहल ने फिल्म की कमान पूरी तरह अपने पास रखी है। हर एक दृश्य आनंद की जिंदगी की कड़वी हकीकत को बहुत ही संजीदगी के साथ बयां करता है। आनंद के गम में आप दुखी होते हैं और उसकी सफलता पर खुद सफल होने की खुशी महसूस करते हैं। इससे ज्यादा सफलता किसी निर्देशक को नहीं मिल सकती।

अभिनय की बात करें भारतीय सिनेमा के ग्रीक गॉड कहे जाने वाले रितिक रोशन को पहली बार इतने डीग्लैम अवतार में पेश किया गया है जिसमें रितिक पूरी तरह सफल रहे। हालांकि कहीं-कहीं बिहारी भाषा में उनके उच्चारण में दोष नजर आता है मगर वह दोष अभिनय पूरी तरह से ढंक देता है। मृणाल ठाकुर के रोल की ज्यादा लंबाई तो नहीं थी लेकिन जितनी थी उसमें उन्होंने साबित कर दिया कि आने वाले समय में बॉलीवुड उनके ऊपर बड़ा जुआ भी खेल सकता है।

इसके अलावा वीरेंद्र सक्सेना, अमित शाह जैसे कलाकारों ने बेहतरीन प्रदर्शन किया है। आनंद कुमार के 30 बच्चे बने सभी कलाकारों ने नैसर्गिक अभिनय किया। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी और लेखन भी अच्छा है जो फिल्म का सफल बनान में सहायक है। फिल्म अच्छी है जिसे एक बार जरूर देखा जा सकता है।

- पराग छापेकर