अहमदाबाद। गुजरात में आज भी एक ऐसा गांव है, जहां के लोग अषाढ़ महीने की चतुर्दशी से कार्तिक महीने के दशहरा तक गांव में ऊंट गाड़ी, बैल गाड़ी, रथ, दुपहिया और चार पहिया वाले वाहनों को गांव के बाहर ही खड़ा करते है। 350 साल पहले गुरु महाराज के आदेश पर बीमारी से बचने के लिए यह युक्ति आजमाई गई थी।

गुजरात के पालनपुर तहसील के वाघणा गांव में एक अनोखी और लोगों के आस्था के साथ जुड़ी परम्परा आज भी जारी है। यहां बारिश की शुरुआत में पड़ने वाली अषाढ़ सुदी चतुर्दशी से कार्तिम माह के दशहरे तक रथ सहित छोटे-बड़े वाहनों के ले जाने पर प्रतिबंध है। गांव वाले या गांव में आने वाले अन्य गावों के आगंतुक अपना वाहन गांव के बाहर ही रखकर गांव में प्रवेश करते हैं।

इस गांव में गुरु महाराज का वर्षो पुराना मंदिर है। ग्रामीणों में गुरु महाराज के प्रति अटूट विश्वास है। इनका मानना है कि गुरु महाराज के आशीर्वाद से ही गांव में किसी बड़ी बिमारी का प्रकोप नहीं होता। गांव के लोग 350 वर्ष पुरानी अपनी इस परम्परा को आज भी श्रद्धा एवं विश्वास के साथ पालन कर रहे हैं।

मान्यता के अनुसार वर्षों पूर्व महामारी फैलने से गांव के बहुत से लोगो की मौत हो गई जाती थी। ऐसा हर वर्ष होता था। इससे बचने के लिए ग्रामीणों ने 12 वर्ष तक तपस्या करने के बाद मंदिर के महाराज प्राणभारती के पास गए। गुरु महाराज ने उनसे कहा कि वे अषाढ़ महीने की चतुर्दशी से कार्तिक महीने के दशहरा तक रथ, बैलगाड़ी, ऊंट गाड़ी का गांव में प्रवेश न होने दे।

इसका पालन करने पर रोग खतम हो गया था। आज भी गांव के लोग इस प्रथा का बड़ी चुस्ती के साथ पालन करते है। इस समय दौरान गांव में दुपहिया, तिपहिया और चार पहिया वाले वाहनों पर प्रतिबंध है। हालाकि ये वाहन उस समय अस्तित्व में ही नहीं थे।