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Bilaspur News: कैंपस कार्नर, जिंदगी की तलाश में हम...

Updated: | Fri, 16 Apr 2021 12:10 PM (IST)

धीरेंद्र सिन्हा, बिलासपुर। Bilaspur News: वर्ष 1991 में बालीवुड में रिलीज हुई फिल्म साथी का एक गाना काफी प्रसिद्ध हुआ था। जिंदगी की तलाश में हम, मौत के कितने पास आ गए, जब ये सोचा तो घबरा गए, आ गए हम कहां आ गए...। 30 साल बाद लोगों की जुबान पर फिर से यही गाना है। अबकी बार साथी के लिए नहीं बल्कि कोरोना से पैदा हुए हालात के कारण हुआ है। इंसान अब मंथन कर रहा है कि प्रकृति के बीच संतुलन बनाने में कहां विफल हुए, जिसकी इतनी बड़ी सजा चुकानी पड़ रही है। न्यायधानी में स्थिति अत्यंत भयावह होती जा रही है। हर आयु वर्ग के लोग संक्रमण से जान गंवा रहे हैं। मानवता पर कोरोना का ऐसा कहर टूटा है कि शिक्षा का मंदिर भी सुरक्षित नहीं है। न्याय की नगरी में प्रकृति का अन्याय देख लोग कहने लगे हैं जिंदगी की तलाश में हम, मौत के कितने पास आ गए।

प्रोफेसर साहब हम शर्मिंदा हैं

शासकीय अभियांत्रिकी महाविद्यालय कोनी के एसोसिएट प्रोफेसर डा. एमआर मेश्राम की कोरोना संक्रमण के बाद मौत हो गई। इसके बाद से उच्च शिक्षा जगत में सन्नाटा पसर गया है। विद्यार्थियों के दिल में बसने वाले प्रोफेसर साहब के बारे जिन्हें भी पता चला उनकी आंखें नम हो गईं। किसी को यकीन नहीं हो रहा था कि इलेक्ट्रानिक्स के दम पर नए भारत का सपना देखने वाले विद्वान हमारे बीच अब नहीं हैं। एक सवाल उभरा.. आखिर कहां चूक हुई कि हम उन्हें नहीं बचा सके। कोरोना से लड़ने और जीतने का पूरा हौसला था फिर भी कैसे छोड़ गए। इसका जवाब उनके पुत्र ने दिया। कहा कि पिता को कोरोना ने नहीं खराब व्यवस्था ने मारा है। जिस मेडिकल साइंस को भावी इंजीनियरों के दम पर इलेक्ट्रानिक्स एंड टेलीकम्युनिकेशन के रास्ते नया आयाम देना चाहते थे, वहीं पर कम्युनिकेशन गेप हो गया। अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही से जान चली गई।

प्रवेश पर नहले पे दहला

बड़े निजी स्कूलों की बढ़ती मनमानी के बीच मान्यता प्राप्त 'अपना स्कूल की चांदी हो गई है। कोरोनाकाल में अचानक पूछपरख बढ़ गई है। कक्षा एक से 12वीं तक संचालित करने वाले स्कूलों पर थोक में धनवर्षा हो रही है। लग रहा है कि उनकी लाटरी लग गई हो। जी हां यह बिल्कुल सही है। सरकारी मान्यता के बाद भी जिन छोटे स्कूलों को हर साल प्रवेश के लिए बच्चों का टोंटा रहता था। अब यहां प्रवेश संख्या बढ़ने लगी है। ऐसा इसलिए कि जो बड़े स्कूल हर साल प्रवेश के नाम पर मनमानी फीस वसूल रहे थे, उनकी दुकानों पर खतरा मंडराने लगा है। अपना स्कूल में अभिभावकों को काफी सुविधा दी जा रही है। एक छोटी फीस के एवज में सीधे अंकसूची व प्रमाण पत्र मिल रहा है। पालक खुश हैं कि बड़े स्कूल तो बिना पढ़ाए और कक्षा लिए भी अंकसूची देने में आनाकानी कर रहे हैं।

यूजीसी करेगा बिना परीक्षा पास

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा मंडल (सीबीएसई) बोर्ड नई दिल्ली की ओर से कक्षा 10वीं की परीक्षा रद कर बच्चों को सीधे 11वीं कक्षा में प्रोन्न्त करने कके निर्णय के बाद अब उच्च शिक्षा जगत में भी आवाज उठने लगी है। युवा मांग कर रहे हैं कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) को भी बिना परीक्षा लिए ही स्नातक और स्नातकोत्तर छात्रों को पास करने का एलान करना चाहिए। न्यायधानी के कुछ होनहार युवाओं का इसे लेकर अलग ही तर्क है कि आयोग यदि चाहे तो सीधे घर में डिग्री भी भेज सकता है। दरअसल यह होनहारों की नाराजगी है। उनका कहना है कि सीधे प्रोन्न्त करने के बजाए आनलाइन कोई ऐसा ठोस विकल्प निकालना चाहिए जिससे बच्चों के साथ युवाओं का भी मनोबल ऊंचा रहे। विगत दो वर्षों से प्रोन्न्त करने की परंपरा से पढ़ाई में रुचि कम हो रही है। संक्रमण के नाम पर कितने सालों तक परीक्षा से पीछा छुड़ाएंगे।

Posted By: Yogeshwar Sharma
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