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International Nurse Day 2021: कोरोना से बचाने जिंदगी, 24 घंटे ड्यूटी से पीछे नहीं हटतीं बिलासपुर रेलवे की ये नर्स

Updated: | Wed, 12 May 2021 09:40 AM (IST)

बिलासपुर। International Nurse Day 2021: रेलवे केंद्रीय अस्पताल की नर्स इदिथ इनिस के सेवाभाव से अधिकारी से लेकर कर्मचारी और मरीज सभी प्रभावित हैं। कोरोना काल में वे पूरी लगन और बिना आराम काम कर रही हैं। अनुभवी और सक्रियता को देखकर अब उन्हें सबसे बड़ी जिम्मेदारी बेहतर आक्सीजन सप्लाई की मिली है। वे कहती हैं कि मरीज जब स्वस्थ होकर घर लौटते हैं तो मन में अलग तरह की खुशी होती है। लगता है कि जीवन सफल हो गया।

इदिथ इनिस का बचपन से ही लोगों की सेवा करने की इच्छा थी। झांसी में उनकी बुआ रेलवे अस्पताल में ही नर्स थीं। उन्हें देखकर बेहद प्रभावित होती थीं। उसी समय से ठान लिया था कि चाहे जो हो जाए सफेद यूनिफार्म पहनकर मरीजों की जितनी हो सके मदद करेंगी। इसी दृढ़ संकल्प के कारण उन्हें कामयाबी भी मिली और 27 साल पहले अपनी सेवाभाव की इच्छा को पूरी करने के लिए अस्पताल में कदम रखी। तब से लेकर आज तक वे बिना किसी स्वार्थ मरीजों की सेवा कर रही हंै।

नौकरी का पूरा समय तो आसानी से गुजर गया। इसी बीच अदृश्य वायरस की दस्तक हुई। जब उन्हें पता चला कि रेलवे अस्पताल को भी कोविड अस्पताल बनाया गया है। वह जरा भी नहीं डगमगाईं। उनके नौकरीकाल का यह सबसे कठिन दौर था। इसके बाद भी हिम्मत नहीं हारी और आवश्यकता पड़ी तो 24 घंटे अस्पताल में डटी रहीं। उनका कहना है कि जब-जब अवसर मिलेगा इसी तरह मरीजों की सेवा करेंगी।

पहली व दूसरी लहर में रेलवे अस्पताल से कई मरीज स्वस्थ होकर निकले। उन्होंने और स्वजनों ने हमेशा सम्मान दिया। इसे वे जिंदगी की सबसे बड़ी कमाई मानती हैं। वर्तमान में चीफ नर्सिंग सुपरीटेंडेंट के पद पर हैं और उन्हें आक्सीजन सप्लाई की व्यवस्था देखने की जवाबदारी भी मिली है। इस जिम्मेदारी पर भी वे खरी उतरीं।

पेस मेकर और शुगर मरीज हैं

यह जानकारी हैरान करने वाली होगी कि इदिथ को पेस मेकर लगा है। उन्हें दिल से संबंधित समस्या है। इसके अलावा शुगर मरीज भी हैं। पर कभी भी इन बीमारियों का प्रभाव काम में नहीं पड़ने देतीं। वे कहती हैं कि मन में सेवाभाव और काम के प्रति लगन हो तो बीमारियां आड़े नहीं आतीं। वे हर दिन बेहतर उमंग के साथ ड्यूटी पर उपस्थित होती हैं।

संक्रमित होने के बाद फिर संभाली जिम्मेदारी

इदिथ बताती है कि कोरोना संक्रमितों की सेवा करते-करते वह खुद संक्रमित हो चुकी हैं। 17 दिन होम क्वारंटाइन रहीं। इसके बाद दोबारा फिर उसी उत्साह के साथ मरीजों की देखभाल करने के लिए लौट गईं।

जब बचाई एक महिला की जिंदगी

उन्होंने सबसे महत्वपूर्ण पल को साझा किया, जब उनकी तत्परता से एक महिला की जिंदगी बच गई थी। वे बताती है कि वर्ष 1998 में वह रात्रिकालीन ड्यूटी पर थीं। इसी बीच रेलवे की एक महिला को अस्पताल लाया गया। वह पेट दर्द से बेहाल थी। स्थिति इतनी नाजुक थी कि कुछ पल के लिए डर भी गईं।

पर हिम्मत दिखाया और तत्काल डाक्टर को सूचना देकर बुलाई। महिला की ईसीजी की गई और तब पता चला कि दिल में समस्या थी। समय पर दवा व उपचार शुरू होने से महिला की जिंदगी बच गई।

Posted By: sandeep.yadav
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