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Red-Green Signal: रेड-ग्रीन सिग्नल, जिम्मेदार ही बन गए गैरजिम्मेदार

Updated: | Thu, 24 Jun 2021 11:40 AM (IST)

शिव सोनी, बिलासपुर। Red-Green Signal: रेलवे के अपने नियम-कायदे हैं। इसका पालन कराने सख्ती बरती जाती है और जो नहीं मानते उन पर कागजी कार्रवाई होती है। ऐसा करना भी चाहिए। इससे अव्यवस्था नहीं होती। पर दूसरों को पाठ पढ़ाने से पहले खुद का परिपक्व होना भी बेहद जरूरी है। यदि ऐसा नहीं हो तो उंगली उठती ही है। ऐसा कुछ रेलवे के एक विभाग का है। सुरक्षा के साथ-साथ अन्य व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी संभालने वाला यह विभाग खुद नियमों को तोड़ने में किसी तरह कसर नहीं छोड़ रहा है। नो-पार्किंग में खड़ी ये गाड़ियां व्यवस्था संभालने वाले विभाग के कर्मचारियों की हैं। जहां भूल से भी कोई दूसरा गाड़ी रखने की हिमाकत कर दें तो अपराध दर्ज हो जाता है। गाड़ियां भी जंजीरों से जकड़ दी जाती हैं। डर से लोग काफी हद तक अब सुधर भी गए हैं। लोगों को सुधारते-सुधारते अब वे खुद नियमों के उल्लंघन करने के आदी हो गए हैं।

राहत या साहब की खुशी

यात्रियों की सुविधा को ध्यान में रखकर काम करने वाली रेलवे का एक निर्णय चर्चा का विषय बना हुआ है। बात ट्रेनों के परिचालन की है। एक समय था जब संक्रमण के डर से ट्रेनें बेपटरी कर दी गईं। अब उन्हें पटरी पर लाया जा रहा है। हालांकि दूसरी लहर की दस्तक के साथ यात्री नहीं मिलने का हवाला देकर कुछ ट्रेनों के पहिए दोबारा रोके गए हैं। स्थिति अब इसी तरह है। ढूंढने से भी यात्री नहीं मिलते। इस स्थिति में थोक में ट्रेनों को चलाने की घोषणा गले नहीं उतर रही है। अब क्या यात्री मिलने लगेंगे? हालांकि सच्चाई कुछ और है। पूरी कवायद एक साहब को खुश करने के लिए हो रही है। उनका सेवाकाल समाप्त होने वाला है। ट्रेन पटरी पर लाकर उन्हें खुश करने पूरा अमला भरसक प्रयास कर रहा है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो जाते-जाते उनकी कलम किसी का भविष्य बिगाड़ सकती है।

नहीं बनी बात, नेता नाराज

चुनाव होगा या नहीं। अभी इसका कोई ठिकाना नहीं है। पर कर्मचारियों के बीच अपना वजन बढ़ाने यूनियन कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। अब तो एक-दूसरे की टांग भी खींचने लगे हैं। एक पदाधिकारी जो इन दिनों सबसे ज्यादा सक्रिय हैं। कई पदाधिकारियों को उनकी सक्रियता जरा भी नहीं भा रही है। कैसे भी हो सक्रियता को निष्क्रियता में बदलने शिकायतों का दौर भी चलने लगा है। एक पदाधिकारी ने नियम उल्लंघन का हवाला देते हुए शिकायत भी की। इससे जबरदस्त हड़कंप मचा। शिकायत पर जांच हुई। पर इसमें जो सच्चाई सामने आई, उससे शिकायतकर्ता नेताजी को झटका लगा। उन्हें यह साफ कह दिया गया कि शिकायत में दम नहीं है। इसलिए न तो आगे जांच होगी और न कार्रवाई। नेताजी को कौन बताए कि सक्रिय नेता पहले भी बड़ी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर चुके हैं। जिम्मेदार पद पर काबिज होने से नियम-कायदे का बेहतर ज्ञान भी रखते हैं।

ताजा हो गए पुराने दिन

पहले बैठक, संगोष्ठी, समीक्षा ऐसे कई आयोजन रेलवे में आए दिन होते थे। दूर-दराज की कमान संभालने वाले अधिकारियों की एक-दो दिनों में उपस्थिति भी हो जाती थी। संक्रमण ने ऐसे आयोजनों पर ऐसी लगाम कसी कि अफसर यह भूल चुके थे कि उनका भी कोई मुख्यालय है। बड़े दिनों बाद जब जरूरी समीक्षा बैठक में उपस्थिति का निर्देश पहुंचा तो सबसे पहले सबके मन में सवाल था कि आनलाइन तो नहीं होगी। बताया गया कि इस बार कार्यालय में उपस्थित होना पड़ेगा। यह सुनकर उन्हें खुशी हुई। उपस्थित हुए तो सारे अधिकारी एक छत के नीचे जुटे। उनके चेहरे की चमक अलग थी। हर किसी ने यही बात कही कि मुख्यालय आकर ऐसा लगा मानों पुराने दिन लौट गए हों। एक-दूसरे का हाल जाना और यह भी माना अब सब सामान्य हो रहा है। हालांकि इसके बाद बड़े साहब ने कई अहम जिम्मेदारियां भी सौंपी। इसका टेंशन भी रहेगा।

Posted By: Yogeshwar Sharma
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