Chhattisgarh Naxalism News: छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद से निपटने की तकनीक विकसित कर रहे एसपी डा. पल्लव

Updated: | Wed, 29 Sep 2021 08:51 PM (IST)

Chhattisgarh Naxalism News: अनिल मिश्रा- जगदलपुर ( नईदुनिया )। छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सल चुनौती से निपटने के लिए सिर्फ बंदूक का सहारा नहीं लिया जा रहा है बल्कि कारणों को समझकर उसका जड़ से निदान करने की योजना पर काम हो रहा है। इसमें मुख्य किरदार निभा रहे हैं दंतेवाड़ा के एसपी डा. अभिषेक पल्लव। आइपीएस डा. पल्लव ने मनोचिकित्सा विज्ञान में एमडी की उपाधि हासिल की है। वे बीते कई सालों से अलग-अलग तरीकों से नक्सलियों के मनोविज्ञान का अध्ययन कर नक्सल समस्या को खत्म करने की तकनीक विकसित करने में जुटे हैं। उनकी योजनाओं का नतीजा यह रहा कि इस साल 15 अगस्त को अति नक्सल प्रभावित माने जाने वाले दंतेवाड़ा जिले के 15 गांवों को नक्सलमुक्त घोषित किया गया है।

- मनोचिकित्सा विज्ञान में एमडी आइपीएस नक्सल मनोविज्ञान अध्ययन कर तैयार कर रहे रणनीति

डा. पल्लव ने बताया कि जिले के चिकपाल, मारजूम, तेलम, एटेपाल, नहाड़ी, अरनपुर, बुरगुम, नीलावाया, गुमियापाल और पोटाली नक्सल भर्ती के हाटस्पाट हैं। यहां का अध्ययन कर रहे हैं। इसके लिए पुलिस ने आत्मसमर्पण कर चुके 41 ऐसे नक्सलियों की ब्रेन मैपिंग की है, जो पांच लाख से ज्यादा के इनामी थे। बता दें कि एसपी डा. पल्लव लोन वर्राटू यानी घर वापसी अभियान चला रहे हैं। इससे प्रभावित होकर जिले में अब तक 440 नक्सली आत्मसमर्पण कर चुके हैं। इनमें 120 इनामी हैं।


यह निकला अध्ययन में

एसपी ने बताया कि अध्ययन में पता चला कि 70 फीसद नक्सली जबरन भर्ती किए गए थे। औसतन 15.2 साल की आयु में उन्हें नक्सलियों ने घर से उठा लिया था। 17.5 साल की आयु में उन्हें बंदूक थमाई गई। 20.6 साल में उन्हें स्वचालित हथियार दिए गए। 25 फीसद नक्सली पीएलजीए में जाने के बाद घर वापस नहीं लौट पाए। 30 फीसद ऐसे मिले जो पांच साल में एक बार घर जा पाते थे। 20 फीसद से कम ऐसे मिले जिन्हें माता-पिता की मृत्यु पर घर जाने की अनुमति मिली। 25 फीसद की बिना उनकी मर्जी के नसबंदी कराई गई। 30 फीसद आदिवासी कैडर के नक्सली तेलगू कैडर की वजह से भेदभाव के शिकार हुए।

अब यह है योजना

डा. पल्लव कहते हैं कि प्रथम चरण में चिन्हित किए गए दस गांवों के ग्रामीणों को यह समझाया जाएगा कि वे इस भ्रम में न रहें कि कम उम्र में ही सांस्कृतिक संगठनों से जुड़कर नाच-गाना करने वाले उनके बच्चे की धाक जम रही है। उन्हें लगता है कि बच्चा गांव में ही है, जबकि नक्सली धीरे-धीरे उनका ब्रेन वाश कर पीएलजीए में भर्ती कर लेते हैं। बच्चों को यह लगता है कि संगठन में ग्लैमर है। इसके बाद वह लौट नहीं पाता। लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी होती है।

कारणों को समझकर नक्सल चुनौती से निपटने का मास्टर प्लान बनाया

नक्सल मनोविज्ञान को समझने का उद्देश्य यह है कि समस्या को ठीक से पहचाना जाए ताकि उसका निदान हो सके। क्यों युवा नक्सलवाद की ओर आकर्षित हो रहे हैं, यह जानना जरूरी है। पहले तो वह यही कहकर ले जाते हैं कि नाच गाना कराएंगे, पर बाद में जान जोखिम में डाल देते हैं। कारणों को समझकर नक्सल चुनौती से निपटने का मास्टर प्लान बनाया जाएगा। - सुंदरराज पी, आइजी बस्तर

Posted By: Kadir Khan