Raipur Local Edit: नवजातों की मौत, छत्‍तीसगढ़ में चिकित्सा सुविधाओं पर एक बार फिर गंभीरता से विचार करने की जरूरत

Updated: | Tue, 19 Oct 2021 03:32 PM (IST)

Raipur Local Edit: रायपुर। अंबिकापुर के सरकारी मेडिकल कालेज अस्पताल में तीन दिनों में सात नवजातों की मौत ने प्रदेश में चिकित्सा सुविधाओं पर एक बार फिर गंभीरता से विचार करने की परिस्थितियां उत्पन्न कर दी हैं। प्रदेश में प्रति वर्ष जन्म लेने वाले छह लाख नवजातों में औसतन 22 हजार से अधिक को चिकित्सकीय देखभाल के लिए विशेष कक्षों (एसएनसीयू, स्पेशन न्यूबार्न केयर यूनिट्स) में रखने की जरूरत पड़ती है, जिनमें 20 से 25 फीसद तक की इलाज के दौरान मौत हो जाती है।

अंबिकापुर में नवजातों की मौत की खबरों के कारण प्रदेश की राष्ट्रीय स्तर पर खराब होती छवि ने स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव को अपना तीन दिवसीय दिल्ली दौरा बीच में ही छोड़कर लौटने को मजबूर किया तो मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के निर्देश पर प्रभारी मंत्री डा. शिव डहरिया को भी अंबिकापुर पहुंचना पड़ा।

खाद्य मंत्री अमरजीत भगत सहित तीनों मंत्रियों ने जिस तरह से सक्रियता दिखाई, उसके लिए प्रदेश सरकार की संवेदनशीलता की सराहना की जा सकती है। इन सबके बीच अंबिकापुर के घटनाक्रम का विश्लेषण करें तो स्पष्ट हो जाता है कि इलाज के दौरान मरे पांच नवजातों का जन्म समय से पहले (प्रीमैच्योर) हुआ था और कुछ का वजन जन्म के समय एक किलो से भी कम था।

अस्पताल में मंत्रियों के पहुंचने के वक्त 30 बिस्तरों वाले एसएमसीयू में 47 नवजात दाखिल थे। राजधानी रायपुर के जवाहर लाल नेहरू सरकारी मेडिकल कालेज से जुड़े डा. आंबेडकर अस्पताल स्थित नीकू (नीयो नेटल इंटेंसिव केयर यूनिट) में भी समय पूर्व जन्मे बच्चों की स्थिति कुछ ऐसी ही है, जहां प्रतिमाह जन्म लेने वाले औसतन पांच सौ बच्चों में दो सौ को नीकू वार्ड में रखने की जरूरत पड़ती है और उनमें से औसतन 50 की इलाज के दौरान मौत हो जाती है।

इस प्रकार प्रीमैच्योर बच्चों की मौत का आंकड़ा 25 फीसद तक पहुंच जाता है। सुधार के लिए पूरी व्यवस्था की समीक्षा की जरूरत है। गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य के देखभाल की जिम्मेदारी स्वास्थ्य विभाग के पास तो है ही महिला और बाल कल्याण विभाग की भी भूमिका होती है। मितानीनों की सहायता से खानपान में पोषक तत्वों की व्यवस्था की जाती है, ताकि नवजातों का वजन ठीक रहे।

प्रीमैच्योर और कम वजन वाले बेहद कमजोर बच्चों के इलाज की बड़ी चुनौती का सामना करने के लिए आवश्यक संसाधन के साथ-साथ पर्याप्त संख्या में विशेषज्ञ चिकित्सकों और सहायक कर्मचारियों की व्यवस्था जरूरी है। यह अच्छी बात है कि सरकार की तरफ से तीन मंत्री एक साथ अंबिकापुर पहुंचे और वास्तविकताओं से परिचित हुए।

उम्मीद की जानी चाहिए कि जनप्रतिनिधियों के हस्तक्षेप से व्यवस्था में सुधार के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। वर्तमान समय में तो राजधानी रायपुर के शीर्ष सरकारी अस्पतालों में भी चिकित्सकों और दवाओं की भारी कमी कोई छुपी हुई बात नहीं है।

Posted By: Kadir Khan