HamburgerMenuButton

आलेख: सालता भाषाई शालीनता का अभाव : जगमोहन सिंह राजपूत

Updated: | Sat, 02 Jan 2021 12:11 PM (IST)

अपना नया पेशेवर दायित्व संभालने के लिए करीब पचास वर्ष पहले मैं बनारस से भुवनेश्वर गया था। मेरा परिवार साथ था। उसमें मेरी डेढ़ साल की बेटी भी थी। वहां पहुंचने के सात-आठ दिन बाद एक आठ-नौ साल की बच्ची अपनी मां के साथ मेरे घर आई और मेरी बेटी के साथ खेलने लगी। वह उडिय़ा बोलती रही थी। हम उस भाषा से अपरिचित थे। थोड़ा सशंकित भी थे कि उसके कारण कारण यहां कठिनाई होगी। तभी मैंने उस बच्ची को अपनी बेटी के लिए एक मीठी-सी झिड़की के रूप में एक 'अभद्रÓ शब्द 'पिल्लाÓ कहते सुना! उस शब्द का वह उपयोग मुझे अत्यंत सार्थक लगा। उसके बाद मैंने कई विद्वानों से इस पर चर्चा की और भाषा की पवित्रता को जानने का प्रयास किया। बाद में अपने विद्याॢथयों को भी भाषा की शालीनता तथा पवित्रता का ध्यान रखने के लिए प्रेरित करता रहा। मैैं उस बच्ची को आज भी याद करता रहता हूं, जिसने मुझे जीवन में एक ऐसा पाठ पढ़ा दिया था जो मैं कभी भूला नहीं।

मैंने अपने पिछले साठ वर्ष 'पढ़े-लिखेÓ लोगों के बीच ही बिताए हैं। इस दौरान देश-विदेश में अनेक विद्वानों के बीच जाने और विभिन्न विषयों पर चर्चा करने का अवसर मिला। मेरा निष्कर्ष यही रहा है कि भाषा की जो शालीनता भारत में या यों कहें की पूर्व की संस्कृति में है वह अपने में अद्भुत है। इलाहाबाद (अब प्रयागराज) विश्वविद्यालय के अपने दिनों में मैंने देश के कई बड़े मनीषियों को सुना। उनमें स्वतंत्रता सेनानी और पक्ष-विपक्ष के कई महत्वपूर्ण नेतागण शामिल थे। उनकी वक्तृता, विश्लेषण क्षमता, अध्ययन, ज्ञान तथा सेवा के प्रति समर्पण हमें हर बार नई सीख दे जाते थे। वहां सत्ता पक्ष के नेताओं द्वारा अपनी उपलब्धियां भी गिनाई जाती थीं। वहीं विपक्ष उनकी धज्जियां भी उड़ाता था। इसमें हमें आनंद आता था। हमें नई जानकारियां भी मिलती थीं और अधिक पढऩे-जानने की इच्छा बढ़ती थी। डॉ. राममनोहर लोहिया की विद्वता और विश्लेषण क्षमता का निशाना पंडित नेहरू बनते थे। पंडित नेहरू को सारा इलाहाबाद अपना मानता था, प्यार करता था। दूसरी ओर डॉ. लोहिया को भविष्य की उम्मीद मानता था और उनकी आलोचनाओं का आनंद भी उठता था। दुख की बात है कि पक्ष-विपक्ष के नेताओं के बीच वह पारस्परिक सम्मान तथा भाषाई शालीनता आज कहीं तिरोहित हो गई है। भाषाई अभद्रता का भारत की राजनीति में तेजी से सामान्यीकरण हो रहा है। चिंता की बात है कि इसे रोकने के प्रयास भी नहीं किए जा रहे हैैं?

मैंने कई जानकारों से इस पर चर्चा की है। सभी को भारत की भावी पीढिय़ों की चिंता है। पारस्परिक सम्मान और श्रद्धा में आई यह कमी बहुधा उनकी भाषा में दिखाई-सुनाई पड़ती है। पिछले लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए 'चौकीदार चोर हैÓ देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस का नारा था। तब राहुल गांधी की ओर से जन सभाओं में यह नारा लगाया जाता था। मुझे उन्हीं दिनों फ्रांस जाने का अवसर मिला था। वहां भी लोग जानना चाहते थे कि क्या इसमें कोई सच्चाई है? मैंने उत्तर तो दिया, मगर अपने अंदर पीड़ा और अपमान बोध भी सहन किया। मुझे प्रतिक्रियास्वरूप याद आया कि जब डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री के पद पर आए थे तब विपक्ष में अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे तपे हुए अनुभवी नेता उपस्थित थे। उनमें से किसी ने नहीं कहा था कि एक व्यक्ति द्वारा केवल अपनी पसंद के कारण किसी दूसरे को इतने महत्वपूर्ण पद पर बैठाना प्रजातंत्र तो नहीं था। तकनीकी तौर पर कुछ भी कहा जाए, पर डॉ. मनमोहन सिंह न देश की पसंद थे, न ही कांग्रेस पार्टी के। वह शायद स्वयं भी इसे जानते और समझते रहे होंगे। वह यह भी जानते होंगे कि भारत का प्रधानमंत्री उसी को बनना चाहिए जिसे जनता ने चुना हो। जबकि वह राज्यसभा से यह हलफनामा देकर चुने गए थे कि वह सामान्यत: असम में निवास करते हैं। तत्कालीन विपक्ष ने यह प्रश्न भी कभी नहीं उठाया कि कम से कम दूसरे कार्यकाल में तो उन्हेंं लोकसभा का चुनाव लडऩा ही चाहिए था। इसके अलावा 2004-14 तक के दस वर्षों में जितने घोटाले देश के सामने आए, वह इतिहास है। मुझे याद नहीं है कि उस समय किसी विपक्षी दल या नेता ने प्रधानमंत्री या किस मंत्री को चोर कहा हो। क्या इसका मुख्य कारण केवल यह था कि तब विपक्ष के पास प्रबुद्ध और विचारशील नेतृत्व उपस्थित था?

वास्तव में प्रजातंत्र में ऐसा नेतृत्व उभरना असंभव है जिसमें किसी प्रधानमंत्री को सभी लोग पसंद करते हों। यह नरेंद्र मोदी के साथ भी लागू है। गुजरात के मुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए जितनी आलोचना और तत्कालीन सत्तापक्ष और सरकारी तंत्र का दबाव उन्होंने झेला है, वैसा अन्य कोई उदाहरण नहीं है। आलोचना और तिरस्कार सहने में वह अद्वितीय हैं। जब उन्हें चोर कहा जा रहा था तब उसका उनके ऊपर कोई प्रभाव पड़ा हो, इसे कोई नहीं मानेगा। निश्चित ही यह नारा कांग्र्रेस पर ही उल्टा पड़ गया और चुनाव में नरेंद्र मोदी को जबरदस्त लाभ पहुंचाया। दुख की बात है कि इस समय जब देश कोरोना, चीन और पाकिस्तान का एक साथ सामना कर रहा है, तब भाषागत शालीनता को फिर से भुला दिया गया है। प्रधानमंत्री से पूछा जा रहा है कि 'कहां छिपे होÓ और 'डरे क्यों होÓ! यह आत्मघाती रवैया है जो विपक्ष की ओर से बार-बार दोहराया जा रहा है। इससे विपक्ष कमजोर हो रहा है। सामान्य नागरिक एक सबल और सतर्क विपक्ष को प्रजातंत्र में आवश्यक मानता है। जाहिर है भाषा की शालीनता सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ओर स्वीकार्य होनी ही चाहिए। लोकतंत्र में यह सहयोग, संवाद और सहमति के लिए पहली सीढ़ी है।

(लेखक शिक्षा और सामजिक सद्भाव के क्षेत्र में कार्यरत हैं)

Posted By: Arvind Dubey
This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy and Cookie Policy.