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आलेख : वैश्विक कंपनियों को लुभाने का वक्त - डॉ. जयंतीलाल भंडारी

Updated: | Sat, 16 May 2020 10:29 AM (IST)

हाल ही में यह खबर आई कि कई देशों की 1 हजार से अधिक दिग्गज कंपनियां चीन से अपना निवेश समेटकर और उत्पादन बंद कर भारत आकर मैन्युफैक्चरिंग करना चाहती हैं। खासतौर से जापान, अमेरिका, दक्षिण कोरिया और ब्रिटेन की कई कंपनियों भारत को प्राथमिकता देते हुए दिखाई दे रही हैं। ये चारों देश भारत के टॉप-12 ट्रेडिंग पार्टनर्स में शामिल हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे चीन पर अपने देशों की कंपनियों की निर्भरता खत्म करने के अगुआ बन गए हैं।

गौरतलब है कि 5 मई को ख्यात वैश्विक कंपनी ब्लूमबर्ग द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में भी कहा गया था कि कोरोना महामारी के कारण चीन के प्रति नाराजगी से कई वैश्विक कंपनियां अपने मैन्युफैक्चरिंग का काम पूरी तरह या आंशिक रूप से चीन से बाहर स्थानांतरित करने की तैयारी कर रही हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि चीन से बाहर निकलती कंपनियों को आकर्षित करने के लिए भारत इन्हें बिना किसी परेशानी के जमीन मुहैया कराने पर काम कर रहा है। भारत सरकार ने इन कंपनियों के कारखानों को स्थापित करने के लिए देश के विभिन्न् औद्योगिक क्षेत्रों में 4,61,589 हेक्टेयर जमीन की पहचान की है।

यहां पर यह भी उल्लेखनीय है कि 4 मई को गुटनिरपेक्ष देशों के वर्चुअल सम्मेलन को वीडियो कांफ्रेसिंग के जरिए संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि कोरोना संकट के समय दुनिया में भारत को मददगार देश माना जा रहा है। कोरोना की चुनौतियों के बीच भारत ने दवाइयों की मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाकर दुनिया के 120 से ज्यादा देशों को दवाइयाँ निर्यात की है। ऐसे में भारत को दुनिया की नई फॉर्मेसी के रूप में देखा जा रहा है। निस्संदेह जहां कोरोना संकट से परेशानियों का सामना कर रहे कई देशों को भारत ने दवाइयों और खाद्य पदार्थों सहित कई वस्तुओं का निर्यात करके राहत दी है, वहीं भारत के लिए नई मैन्युफैक्चरिंग संभावनाओं को भी आगे बढ़ाया है।

पिछले दिनों 30 अप्रैल को प्रधानमंत्री मोदी ने अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने, वैश्विक निवेश को आकर्षित करने की रणनीतियों पर चर्चा करने के लिए एक व्यापक बैठक की। प्रधानमंत्री ने कहा कि कोविड-19 की वजह से वैश्विक अर्थव्यवस्था में अफरा-तफरी है और चीन में निवेश करने वाली कंपनियां इसके विकल्प की तलाश में है। ऐसे में सरकार ने देश में मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए प्रमुखतया 10 सेक्टरों की पहचान की है। इनमें इलेक्ट्रिकल, फार्मा, मेडिकल उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक्स, हैवी इंजीनियरिंग, सोलर उपकरण, लेदर प्रोडक्ट, फूड प्रोसेसिंग, केमिकल और टैक्सटाइल्स शामिल हैं।

यह बात भी महत्वपूर्ण है कि भारत के वैश्विक मैन्युफैक्यरिंग हब बनने की नई संभावनाओं को साकार करने के लिए प्रधानमंत्री ने प्लग एंड प्ले मॉडल को साकार करने हेतु केंद्र और राज्य सरकारों के शीघ्र रणनीतिक कदमों की आवश्यकता बताई है। इस परिप्रेक्ष्य में केंद्र सरकार के कुछ विभागों ने पहल करनी शुरू भी कर दी है। चीन से निवेश निकालकर अन्य देशों में ले जाने की कोशिश कर रही विदेशी कंपनियों से विशेष संपर्क किया जा रहा है। इसी तरह पिछले दिनों केंद्र सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के साथ बैठक आयोजित की, जिसमें कोरोना वायरस का संकट खत्म होने के बाद भारत को पूरी दुनिया की सप्लाई चेन का प्रमुख हिस्सा बनाने की बेहतर संभावनाओं को मुठ्ठी में करने की योजना पर काम शुरू करने का निर्णय लिया गया।

इसी तारतम्य में वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने निवेशकों को आकर्षित करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी के प्लग एंड प्ले मॉडल को साकार करने के मद्देनजर मोडिफाइड इंडस्ट्रियल इन्फ्रास्ट्रक्चर अपग्रेडेशन स्कीम (एमआईआईयूएस) में बदलाव करने तथा औद्योगिक उत्पादन के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) में गैर-उपयोगी खाली पड़ी जमीन का इस्तेमाल करने के संकेत दिए हैं। प्लग एंड प्ले व्यवस्था में कंपनियों को सभी इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार मिलते है और उद्योग सीधे उत्पादन शुरू कर सकता है। इसी तरह सरकार सेज में खाली पड़ी करीब 23 हजार हेक्टेयर से अधिक जमीन का इस्तेमाल नए उद्योगों के लिए कर सकती है। सेज में सभी बुनियादी ढांचा सुविधाएं मसलन बिजली, पानी और सडक जैसी सुविधाएं मौजूद हैं।

निश्चित रूप से कोविड-19 के कारण दुनियाभर में चीन के प्रति बढ़ती नकारात्मकता के बीच भारत ने कोरोना से लड़ाई में सबके प्रति मददगार रवैया अपनाकर पूरी दुनिया में अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाई है। ऐसे में भारत में वैश्विक निवेश, वैश्विक कारोबार और वैश्विक निर्यात बढ़ने की नई संभावनाएं उभरकर दिखाई दे रही हैं। चीन से बाहर निकलते निवेश और निर्यात के मौके भारत की ओर आने की संभावनाएं भी उज्ज्वल हैं।

फिर यह बात भी गौरतलब है कि कई आर्थिक मापदंडों पर भारत अभी भी चीन से आगे है। भारत दवा निर्माण, रसायन निर्माण और बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्रों में सबसे तेजी से उभरता हुआ देश भी है। भारत की श्रमशक्ति का एक सकारात्मक पक्ष यह है कि भारत में श्रम लागत चीन की तुलना में सस्ती है। भारत के पास तकनीकी और पेशेवर प्रतिभाओं की भी कमी नहीं है। भारत के पास पैंतीस साल से कम उम्र की दुनिया की सबसे बड़ी जनसंख्या है। दुनिया में सबसे अधिक अंग्रेजी बोलने वाले वाले भी भारत में ही हैं। ये सब विशेषताएं भारत को चीन से छिटकने वाले निवेश और कारोबार के मद्देनजर दूसरे देशों की तुलना में अधिक उपयुक्त और आकर्षक बनाती हैं।

एक ऐसे समय में जब भारत के लिए दुनिया का नया कारखाना बनने की संभावनाओं रेखांकित हो रही हैं, तब इन संभावनाओं को साकार करने के लिए हमें कई बातों पर ध्यान देना होगा। हमें शोध, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा के मापदंडों पर आगे बढ़ना होगा। अर्थव्यवस्था को डिजिटल करने की रफ्तार तेज करनी होगी। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की अहम भूमिका बनाई जानी होगी। हमें अपनी बुनियादी संरचना में व्याप्त अकुशलता एवं भ्रष्टाचार पर नियंत्रण कर अपने प्रॉडक्ट की उत्पादन लागत कम करनी होगी।

इन विभिन्न् प्रयासों के साथ-साथ एक नया जोरदार प्रयास यह भी करना होगा कि जो कंपनियां चीन से निकल अन्य देशों में जाना चाहती हैं, उनसे विभिन्न् माध्यमों से संपर्क अभियान तेज किया जाए और उनकी दिक्कतों को समझ उनका निराकरण किया जाए। भारत आने वाली विदेशी कंपनियों के लिए कारगर तरीके से विशेष सुविधाएं भी जुटाई जानी होगी।

हम उम्मीद करें कि चीन के प्रति बढ़ती वैश्विक नकारात्मकता के इस माहौल में भारत चीन से निकलते विदेशी निवेश के उभरते मौकों को अपने रणनीतिक प्रयासों के जरिए लपकने में सफल रहेगा।

(लेखक अर्थशास्त्री हैं)

Posted By: Arvind Dubey
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