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अधबीच कचौड़ी... करोड़पति और मैं

Updated: | Fri, 28 Jun 2019 07:35 PM (IST)

(अंशुमाली रस्तोगी letter@naidunia.com)

पकौड़े बेचने का प्लान धरा का धरा रह गया। अब तय किया है कि कचौड़ी बेचूंगा! जब से अलीगढ़ के कचौड़ी वाले की करोड़पति होने की खबर देखी है, तब से मन बना लिया कि करियर अब कचौड़ी बेचने में ही बनाना है!

यों भी, हिंदुस्तान में पकौड़े-कचौड़ी वालों का भविष्य उज्ज्वल है। हिंदुस्तानी सबकुछ छोड़ सकता है पर खाना, वो भी बाहर का, कभी नहीं छोड़ सकता। मुझे ही ले लीजिए, हफ्ते में सात दिन मैं खाना बाहर का ही खाता हूं। सात दिन इसलिए क्योंकि हफ्ते में दिन ही सात होते हैं। इस मसले पर बीवी से विवाद भी खूब होता है, लेकिन जब बीवी पर कंट्रोल न कर सका तो जीभ पर कैसे करूं!

नौकरी या लेखन में अब कुछ रक्खा नहीं। खर्च बढ़ता जा रहा है और आमदनी वही अठन्नी। नौकरी में क्या कम झंझट हैं। बॉस की सुनो। क्लाइंट की सुनो। टाइम पर आओ जरूर पर जाने का कोई टाइम नहीं।

ऊपर से हजार तरह की खुर-पेंच। छुट्टी मांगो तो लगे की भीख मांग रहे हैं। शाम को थके-हारे घर लौटो तो बीवी की शिकायतें और किस्म-किस्म की फरमाइशें। किस्म पर ज्यादा दिमाग न लगाइएगा, बात पिक्चर दिखाने, शॉपिंग कराने, ससुराल जाने देने संबंधी फरमाइशों की है।

लेखन में ही भला कौन-सा सुख है। नौकरी की तरह ही लेखन में भी दबाके कॉम्पिटिशन हो गया है। इतनी तरह के तो लेखक आ गए हैं। कोई भी लेखक हजार तरह का लेखन कर गुजरता है। यह नहीं कि अगला व्यंग्य लिखता है तो व्यंग्य ही लिखेगा। व्यंग्य के साथ वो कविता, कहानी और उपन्यास भी लिख-पेल लेता है। वो तो गनीमत है कि अब नहीं लिखते, वरना पहले तो वे वक्त-जरूरत पड़ने पर मकान की रजिस्ट्री, किरायानामा, नोटरी की ड्राफ्टिंग आदि भी लिख लेते थे। लेखक जो ठहरे।

जहां तक लिखकर पेट भर सकने की बात है तो लिखने के बाद भी यह गारंटी नहीं कि फलां जगह छपेगा ही। और छप भी गया तो चेक या नकद मिलेगा ही! जुगाड़ अपन को आता नहीं, इसके बिना छप पाता नहीं।

कितने ही पुरस्कार जुगाड़ के चलते इस या उस को दिए और दिलवा दिए जाते हैं। यहां तो इतना समय हो गया लिखते हुए, मजाल है किसी ने पुरस्कार के नाम पर एक कलम भी दी हो। कुछ जगह तो मेहनताने के पैसे तक

दबे पड़े हैं। मगर देखने वाले को लगता है कि अगला लेखक है तो दबाकर पीट रहा होगा। इसीलिए तो मैंने नौकरी और लेखन को त्याग कर कचौड़ी बेचने का निर्णय लिया है। कम से कम रोज की कमाई तो पक्की है इसमें। न बॉस की जली-कटी सुनने को, न क्लाइंट की गीदड़-भभकी झेलने को मिलेगी। जब चाहो कचौड़ियां तलो, न मन

हो तो मत तलो।

हालांकि मेरे इस निर्णय पर बीवी को घोर टाइप की आपत्ति है। वो कहती है- 'इत्ती अच्छी जॉब छोड़कर कचौड़ी बेचोगे! तुम्हें शर्म नहीं आएगी? नाते-रिश्तेदारों में नाक कटवाओगे क्या?" मैं उसे समझाने की कोशिश करता हूं- 'कचौड़ी से नाक का क्या ताल्लुक? जब अलीगढ़ के करोड़पति कचौड़ी वाले की नाक नहीं कटी तो मेरी क्यों

कटेगी?" मेरा ये जवाब सुन वो मेरी ओर हिकारत भरी नजर से देखती है, हालांकि करोड़पति शब्द उसके कान में गूंज गया है।

इसलिए अब मैंने तय कर लिया है कि ठेला तो मैं कचौड़ी का ही लगाऊंगा। भले ही फिर मेरे खुद के पकौड़े क्यों न तल जाएं?

Posted By: Rahul Vavikar
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