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आलेख : पुलिस सुधारों पर अमल का लंबा इंतजार - प्रकाश सिंह

Updated: | Sat, 26 Sep 2020 04:00 AM (IST)

यह 22 सितंबर 'पुलिस सुधार दिवस के रूप में याद किया गया, क्योंकि 2006 में इसी तिथि को सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस सुधार संबंधी अपना ऐतिहासिक फैसला दिया था। 14 वर्ष बीत गए, लेकिन उक्त फैसले में दिए गए निर्देशों के अनुपालन का संघर्ष अभी भी चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने उक्त फैसले में लिखा था कि उसके निर्देश तभी तक लागू रहेंगे, जब तक केंद्र सरकार और राज्य सरकारें इन निर्देशों के अनुरूप अपने-अपने अधिनियम नहीं बना लेतीं। राज्य सरकारों ने इस बिंदु का लाभ उठाते हुए जल्दी-जल्दी अधिनियम बना लिए। अभी तक देश के 18 राज्यों ने अपने-अपने पुलिस अधिनियम बना लिए हैं।

कायदे से इन अधिनियमों का उद्देश्य यह होना चाहिए था कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का अनुपालन हो, परंतु वास्तव में इन अधिनियमों द्वारा वर्तमान व्यवस्था को ही कानूनी जामा पहना दिया गया। दरअसल राज्य सरकारें यह चाहती थीं कि वे सुप्रीम कोर्ट के पर्यवेक्षण से बाहर हो जाएं। इसी नीयत से उन्होंने मनचाहे तरीके से अपने कानून बना लिए। यह दूसरी बात है कि इन कानूनों की संवैधानिकता को सुप्रीम कोर्ट में देश के जाने-माने वकील हरीश साल्वे ने चुनौती दी है। बाकी राज्यों ने पुलिस सुधार के लिए शासनादेश जारी किए। कुल मिलाकर वास्तविकता यह है कि सभी अधिनियम और शासनादेश सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का जहां-तहां उल्लंघन करते हैं। जस्टिस थॉमस कमेटी ने 2010 में अपनी रिपोर्ट में यह स्पष्ट रूप से लिखा भी था कि किसी भी राज्य ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का ईमानदारी से अनुपालन नहीं किया।

चूंकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा पुलिस सुधारों की मॉनिटरिंग जारी है, इसलिए इस संबंध में बीते दिनों देश के कई विशिष्ट नागरिकों ने एक अपील जारी की। अपील में इस बात पर खेद प्रकट किया गया कि देश की किसी भी बड़ी राजनीतिक पार्टी ने पुलिस सुधार में आवश्यक दिलचस्पी नहीं ली। ऐसा प्रतीत होता है कि सभी राजनीतिक दल पुलिस को अपने राजनीतिक एजेंडे की पूर्ति का साधन समझते हैं। यह भी कहा गया कि पुलिस सुधार के बिना देश की प्रगति नहीं हो सकती और चेतावनी दी गई कि अगर पुलिस सुधार नहीं हुए तो देश के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए एक दिन गंभीर खतरा खड़ा हो सकता है। अपील में यह भी उल्लेख किया गया कि देश की आर्थिक प्रगति के लिए पुलिस सुधार आवश्यक हैं, क्योंकि बिना बेहतर शांति-व्यवस्था के निवेशक आकर्षित नहीं होंगे।

इस अपील पर हस्ताक्षर करने वालों में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस आरसी लाहोटी और जाने-माने वकील फली नरीमन समेत कई पूर्व पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारी शामिल थे। इस अपील को कॉमन कॉज, कॉमनवेल्थ ह्युमन राइट्स, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स, फाउंडेशन फॉर रेस्टोरेशन ऑफ नेशनल वैल्यूज, सिटीजंस फोरम इंडिया आदि ने भी अपना समर्थन दिया।

सुप्रीम कोर्ट में पुलिस सुधार की लड़ाई तो चलती रहेगी, लेकिन पुलिस सुधार का एक आंतरिक पहलू भी है, जिस पर अभी तक विशेष ध्यान नहीं दिया गया है। वास्तव में यह पहलू पुलिस अधिकारियों के कार्य क्षेत्र में आता है। खास बात यह है कि इन सुधारों के लिए न तो अतिरिक्त धनराशि की आवश्यकता होगी, न ही राज्य सरकार को अधिनियम बनाने होंगे और न ही इन सुधारों का राजनीतिक या किसी अन्य स्तर पर विरोध होगा। पुलिस को सिर्फ अपनी आंतरिक व्यवस्था ठीक करनी होगी।

सबसे पहले तो थाने का माहौल बदलना होगा। आज की तारीख में कोई भी शिकायतकर्ता थाने में जाता है तो उसके मन में अनेक प्रकार की शंकाएं होती हैं। रिपोर्ट लिखी जाएगी या नहीं, रिपोर्ट लिखने में कहीं पैसा तो नहीं मांगा जाएगा, कितने घंटे थाने बैठना पड़ेगा, शिकायत पर कोई कार्रवाई होगी या नहीं? यदि शिकायतकर्ता कोई महिला हुई तो उसके मन में यह सवाल भी उमड़ता है कि मेरे साथ सही व्यवहार होगा या नहीं? क्या यह संभव नहीं कि शिकायतकर्ता थाने में इस विश्वास के साथ जाए कि न केवल उसकी तकलीफ सुनी जाएगी, बल्कि उस पर आवश्यक कार्रवाई भी होगी। कोई व्यक्ति जब अस्पताल जाता है तो इसी आशा के साथ जाता है कि उसे कुछ दवा दी जाएगी और उससे उसे लाभ होगा। आखिर इसी आशा के साथ आम आदमी थाने क्यों नहीं जा सकता? जनता के प्रति पुलिसकर्मियों की सोच और व्यवहार में परिवर्तन की आवश्यकता है। इसके लिए कोई कानून नहीं बनाया जा सकता। परिवर्तन अंदर से आना है। अधिकारियों को इसे सुनिश्चित करना होगा।

रिपोर्ट दर्ज होने में बहुत सुधार की गुंजाइश है। यदि ज्यादा एफआइआर दर्ज होती हैं तो सरकार के संज्ञान में तथ्य लाकर अतिरिक्त बल की मांग की जा सकती है। गरीब जनता और खासकर जनजातियों के प्रति दृष्टिकोण में भी परिवर्तन की आवश्यकता है। आज ऐसा माहौल है कि जिस आदमी का राजनीतिक या आर्थिक प्रभाव है, उसकी बात तो सुनी जाती है, परंतु बाकियों का दुख-दर्द अमूमन नहीं सुना जाता।

हाल में देश में कई ऐसे प्रकरण हुए हैं, जिन्हेंं देखकर यह लगता है कि पुलिस विभाग में बड़े पैमाने पर सफाई की जरूरत है। उत्तर प्रदेश में तो प्रयागराज के एसएसपी और महोबा के एसपी को गंभीर आरोपों के कारण निलंबित भी किया गया। इसी तरह हाल में ही सीबीआइ ने उन्न्ाव में दुष्कर्म की घटना के संदर्भ में जिलाधिकारी और तीन पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध उचित कार्रवाई की संस्तुति की। एक अन्य समाचार के अनुसार सतर्कता निदेशक ने एक आइपीएस अधिकारी की शिकायत पर दो अन्य आइपीएस अधिकारियों के विरुद्ध एफआइआर दर्ज कराने की सिफारिश की है।

ये तो केवल कुछ उदाहरण हैं। ऐसे उदाहरण हर राज्य में देखने को मिल रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि नीचे के स्तर के अधिकारी भारी संख्या में भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। इसके लिए मुख्य रूप से वरिष्ठ अधिकारी जिम्मेदार हैं। यदि वे स्वयं स्वच्छ हों और उनका रुख कड़ा हो तो नीचे के स्तर पर भ्रष्टाचार एवं अनियमितताएं स्वत: कम हो जाती हैं। ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों से निपटने का एक ही उपाय है कि उनके विरुद्ध अनुशासनिक कार्रवाई के पश्चात उन्हेंं नौकरी से निकाल दिया जाए। कुछ भ्रष्ट अधिकारियों को अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त भी किया जा सकता है। जिनके विरुद्ध संज्ञेय अपराध हों, उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज करके कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए। मेरा मानना है कि आंतरिक स्वच्छता एवं परिवर्तन के बिना बाह्य सुधारों में विलंब होता रहेगा।

(लेखक उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक रहे हैं)

Posted By: Ravindra Soni
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