भोपाल बृजेंद्र ऋषीश्वर कॉलम : ये दारोगाजी तो हैं चिकना घड़ा

Updated: | Sat, 04 Dec 2021 11:51 AM (IST)

बृजेंद्र ऋषीश्वर, भोपाल। हाइवे के एक थाने के दारोगाजी से इन दिनों राजधानी के तमाम अफसर परेशान हैं। दो सितारों वाले इन साहब की कारगुजारियां मुख्यालय तक जा पहुंची हैं। अधिकारी उन्हें पटरी पर लाने के लिए बुनियादी पुलिसिंग का पाठ पढ़ाते हैं, पर जनाब हैं कि कुछ सीखने को तैयार ही नहीं हैं। नतीजतन, थाना क्षेत्र में एक के बाद एक हो रहीं चोरी, लूट की वारदातें अधिकारियों के लिए सिरदर्द बनती जा रही हैं। परेशानी वारदातों से कम और साहब द्वारा घटनाओं को पचा जाने की आदत से ज्यादा है। मुसीबत यह है कि दारोगाजी को हाल ही में थाने की कमान सौंपी गई है, लिहाजा इतने कम समय में वापस लेना भी मुमकिन नहीं है। ऐसे में अफसर उन्हें चोर, उचक्कों पर नियंत्रण रखने के गुर सिखाना ज्यादा मुनासिब समझ रहे हैं पर आदत से लाचार जनाब चिकना घड़ा बनकर अधिकारियों की सारी मेहनत पर पानी फेरते जा रहे हैं।

डीसीपी हम भले न रहें पर एसीपी पंसद के होंगे

राजधानी में पहले पुलिस आयुक्त पदस्थापना को लेकर मुख्यालय से मंत्रालय तक सरगर्मी का माहौल है तो शहर के थानों से लेकर कंट्रोल रूम तक डीसीपी और एसीपी की सूचियों का बाजार गर्म हैं। कहीं शर्त पर शर्त लग रही है तो कहीं सूचियां एक थाने से दूसरे थाने दौड़ रही हैं। मजेदार बात यह है कि इसकी अभी इमारत खड़ी भी नहीं हुई है और उसके कमरे पहले ही बांट लिए गए हैं। दो वरिष्ठ अधिकारियों में तो शर्त इस बात की तय हुई है कि फलां साहब कमान संभालेंगे या नहीं। यह अलग बात है कि जिन साहब को लेकर शर्त लगी है, वे खुद असमंजस के भंवर में गोते खा रहे हैं। हालांकि उन्होंने अपने अधीनस्थों की तैनाती की फेहरिस्त बना रखी है और वे अब यह कहते हुए भी दिखाई पड़ रहे कि उन्हें कमान मिले या नहीं, लेकिन उनकी पसंद के अफसर जरूरी तैनात किए जाएंगे।

जोश में होश खो बैठे साहब

पुलिस के एक अफसर इन दिनों उन सभी को पकड़ने में लगे हैं, जो लोगों से शासकीय काम करवाने के नाम पर रिश्वत लेकर अपनी तिजोरी भरते हैं। उनके सहयोगी अफसर भी कहने लगे हैं कि हमारे नए साहब काफी जोश में हैं। साहब ने भी कुछ दिन पहले इसी जोश में ही एक शासकीय विभाग के कर्मचारी को रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ लिया। साहब काफी खुश थे कि नए विभाग में आमद के साथ ही एक रिश्वतखोर को दबोच लिया, लेकिन साहब ने आने वाले संकट के बारे में नहीं सोचा था। उस कर्मचारी ने साहब के बारे में वह सारे साक्ष्य जमा कर लिए, जो साहब को भी नहीं पता थे। पूरी जानकारी ले जाकर साहब के सामने जाकर रख दी, फिर क्या था साहब एक दम शांत हो गए हैं। अब साहब अपने साथियों से कह रहे हैं यार जोश में होश नहीं खोना चाहिए।

साहब का फंडा, अच्छा तो मिलते हैं

शहर में इन दिनों नए पुलिस अधिकारी ने आमद दे दी है। उनका काम करने का तरीका इन दिनों पूरे महकमे में चर्चा का विषय बना हुआ है। साहब सिविल के मामलों की सुनवाई बड़ी गंभीर तरीके से कर रहे हैं। किस मकान, जमीन पर कौन कब्जा करके बैठा है, उसकी जड़ें खोद रहे हैं। उनके काम के दौरान अगर कोई आ जाए तो कुछ देर बात करने के बाद अचानक से बोल उठते हैं, अच्छा तो मिलते हैं। सामने वाला खुद ही समझ जाता है कि हुजूर ने जाने का इशारा कर दिया है। राजधानी में लंबे समय सीएसपी रहे, अब सेवानिवृत्त हो चुके एक साहब का पिछले दिनों इनके पास जाना हुआ। जब वे इन साहब से मिले तो उन्हें भी कुछ देर में ही अच्छा तो फिर मिलते हैं, कह दिया गया। सुनते ही वे बाहर आए और बोले.. गजब है, ज्यादा दिन चलने वाले नहीं हैं।

Posted By: Ravindra Soni