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Naidunia Column Andar Ki Baat: अब काले जादू से कैसे निपटें

Updated: | Tue, 22 Jun 2021 08:12 AM (IST)

अंदर की बात : डाक में आने वाले लिफाफों ने एक विभाग के आयुक्त की नींद उड़ा दी है। बात जब ऐसी हो, तो कोई भी डरेगा। विभाग में आने वाली डाक में ऐसे लिफाफे आ रहे हैं, जिनसे कटे नींबू, सिंदूर और काजल निकल रहा है। अब साहब अनुमान लगा-लगाकर परेशान हैं कि कौन ऐसा है, जो उन्हें इस पद पर बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। बात उद्यानिकी विभाग के आयुक्त की हो रही है। वर्तमान में अपर प्रधान मुख्य वनसंरक्षक स्तर के अधिकारी यहां पदस्थ हैं। वैसे तो इस पद पर आने के लिए अधिकारी लालायित रहते हैं, पर पिछली बार कुछ मामलों की जांच क्या शुरू हुई, कोशिश में लगे अधिकारियों का मन बदल गया। कोई नहीं जाना चाहता था। आखिर अधिकारी ने बीड़ा उठाया और पहुंच गए। अब ये बात किसे खटक रही है। अंदाजा तो खुद आयुक्त को नहीं है। बस वे परेशान हैं कि इससे कैसे निपटें।

बड़े साहब मेहरबान हैं

लेन-देन और महिला प्रताड़ना के मामले में फंसे एक आइएफएस अधिकारी पर उनके आला अधिकारियों की मेहरबानी कम नहीं हो रही है। साहब को 20 दिन पहले मैदानी पदस्थापना से हटाया गया है, उन्हें मुख्यालय में पदभार संभालना था। वे तो अब तक नहीं पहुंचे, पर उनकी मेहमाननवाजी की तैयारी पूरी हो गई। साहब के आने के पहले ही बड़े साहब ने उनके लिए कक्ष पसंद कर लिया और उसे व्यवस्थित करा दिया। आमतौर पर मुख्यालय आने वाले अधिकारियों को वाहन आवंटन के लिए कई दिन भटकना पड़ता है, पर साहब सौभाग्यशाली हैं। उन्हें

कहना तो दूर, इशारा भी नहीं करना पड़ा और उनके लिए वाहन का इंतजाम भी हो गया। अब इंतजार है तो सिर्फ साहब के आने का और पदभार संभालने का और वे कब आएंगे, इसकी जानकारी किसी को नहीं है। कोई कहता है छुट्टी पर हैं, तो कोई कहता है, पता ही नहीं चल रहा है।

शुक्र है उन्हें अपना घर तो याद है

वन मुख्यालय में पदस्थ एक आला अधिकारी इन दिनों अजीब दौर से गुजर रहे हैं। लंबे समय तक घर से बाहर

(विभाग से) रहे महोदय को अपने ही कार्यालय में तैनात कर्मचारियों के चेहरे और नाम याद नहीं रह पा रहे हैं।

कर्मचारी पांच-पांच बार अपना नाम बता चुके हैं, फिर भी जब कोई सामने आता है, उससे नाम पूछ बैठते हैं। अब तो कर्मचारी भी उनकी आदत से तंग आ गए हैं और कह रहे हैं कि अच्छा है, महोदय को अपना घर तो याद है। वैसे ये अधिकारी भी घर वापसी से खुश नहीं हैं। वे अपने साथियों के साथ बैठते हैं, तो उलाहना देते हैं कि जबरिया नीचे से ऊपर लाकर पटक दिया। दरअसल, महोदय इससे पहले ग्राउंड फ्लोर पर दूसरी शाखा में बैठते थे, पर मंत्री की बात उन्हें समझ नहीं आ रही थी। इसलिए उन्हें ऐसा समझाया कि अब सिर्फ डाकिया बनकर रह गए हैं।

हाथी निकल गया, पर पूंछ फंसी है

छह महीने पहले सेवानिवृत्त हुए एक आला अधिकारी उनके समय में निचले स्तर पर हुए घोटाले को लेकर अब भी कुछ बोलने से कतरा रहे हैं और कतराएं भी क्यों न, हाथी भले ही निकल गया हो, पूंछ तो अब भी फंसी है। महोदय सेवानिवृत्ति के ठीक पहले पौधारोपण की तैयारियों में गड़बड़ी का राजफाश कर चर्चा में रहे हैं। उस मामले में अब तक संबंधित मैदानी अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। महोदय के पास पर्याप्त सुबूत हैं, पर वे अपने पत्ते खोलने से बच रहे हैं। उन्हें डर है कि विभाग के ही एक अन्य अधिकारी की तरह उनका हश्र न हो जाए। उस अधिकारी ने सेवानिवृत्ति के बाद मुंह खोला था, तो पेंशन प्रकरण आज तक उलझा पड़ा है। वैसे तो इन महोदय ने भागदौड़ कर अपने वेतन-भत्तों, पेंशन के प्रकरण का ज्यादातर काम समेट लिया है, पर कुछ मामलों में अंतिम मुहर नहीं लगी है।

Posted By: Ravindra Soni
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