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webinar on organ donation: अंग प्रत्‍यारोपण के अभाव में हर दस मिनट में एक व्‍यक्ति की हो जाती है मौत

Updated: | Wed, 14 Apr 2021 03:49 PM (IST)

भोपाल, नवदुनिया प्रतिनिधि, webinar on organ donation:। दिल्ली के अनमोल अब इस दुनिया में नही हैं, लेकिन उनके अंग आज 34 लोगों के जीवन को सुगम बना रहे हैं। एक व्यक्ति का देहदान 4 से 6 एलोपैथी डॉक्टरों को निपुण बनाने में काम आता है। एक डॉक्टर औसतन चार हजार लोगों को जीवन देता है। अंगदान मानव जीवन में सबसे अमूल्य है। इसके प्रति भारत में व्यापक भ्रांतियां है, इन्हें दूर किया जाना चाहिए। अंगदान के क्षेत्र में कार्यरत श्रीशिवम संस्था के हरीश मंत्री ने यह जानकारी चाईल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन की 41 वीं ई- संगोष्ठी को संबोधित करते हुए बताई। संगोष्ठी के दौरान नागपुर के अंगदान मामलों के ख्यात विशेषज्ञ डॉ रवि वानखेड़े ने भी संबोधन दिया।

मुख्य वक्ता हरीश मंत्री ने बताया कि व्यक्ति की ब्रेन डेथ के बाद अगर उसके अंग दान कर प्रत्यारोपित किए जाएं, तो करीब 34 लोगों को जीवन दिया जा सकता है। समाज में अंगदान औऱ देहदान के प्रति लोगों में गलत भ्रांतियां है। हमें यह समझना होगा कि भारतीय सनातन संस्कृति परोपकार औऱ दान की महत्ता पर ही टिकी है। महर्षि दधीचि इसका उदाहरण हैं। उन्होंने बताया कि अंगदान के लिए मोहन फाउंडेशन ऑनलाइन सुविधा उपलब्ध कराता है। अंगदान के बाद मृत देह को मूल स्वरूप में पैक कर ही परिजनों को वापस किया जाता है, इसलिए इस कार्य में हमें आगे आकर पहल करनी चाहिए।

उन्होंने बताया कि भारत में प्रति दस मिनिट में एक व्यक्ति की मौत अंग प्रत्यारोपण के अभाव में होती है। देश मे प्रतिवर्ष दो लाख किडनी की आवश्यकता होती है, लेकिन 6 हजार ही उपलब्ध हो पाती हैं। पचास हजार लिवर के विरुद्ध 750, छह हजार हृदय के विरुद्ध सिर्फ सौ, दो लाख आंखों के विरुद्ध पचास हजार की उपलब्धता है। मौजूदा समय में करीब साढ़े ग्यारह लाख जिंदगियां अंगदान के लिए प्रतीक्षारत है।

एक व्यक्ति के शरीर से 42 अंग दान किए जा सकते हैं

एक व्यक्ति का शरीर अंतिम संस्कार से पहले 42 अंग दान कर सकता है, जिनमें हृदय, पेनक्रियाज, आंख, गुर्दा, हाथ, अंगुलियों तक शामिल हैं। उन्होंने बताया कि अगर किसी मृत शरीर से विहित प्रविधि के तहत किडनी, हृदय, लिवर, लंग्स दूसरे जरूरतमंद व्यक्ति को प्रत्यारोपित कर दिए जाते हैं, तो औसतन 75 फीसद लोग पांच से 20 साल तक नई जिंदगी जीते हैं। उन्होंने बताया कि विकसित देशों में 90 फीसद अंगदान व्यक्ति की ब्रेन डेथ के बाद जुटाए जाते है, जबकि भारत में यह केवल दो फीसद हैं। उन्होंने चाइल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन के सभी सदस्यों से आग्रह किया कि समाज में देह औऱ अंग दान के प्रति जागरूकता मूलक अभियान सुनिश्चित करने में आगे आएं।

प्रकृति से लेते हैं तो देने के बारे में भी सोचना चाहिए

नागपुर के ख्यात चिकित्सक औऱ पूर्व सैन्य अफसर डॉ रवि वानखेड़े ने संगोष्ठी में अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि उन्होंने स्वयं अपने एक मुस्लिम मित्र को किडनी दान की है और वे महाराष्ट्र में मोहन फाउंडेशन की मदद से अंगदान के प्रति लोगों को जागरूक कर रहे हैं। चाइल्ड कंजर्वेशन फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ राघवेंद्र शर्मा ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि जब हम लोगों से या प्रकृति से लेने में भरोसा रखते है तो देने में अलग से सोचने की क़तई आवश्यकता नही है। डॉ राघवेंद्र ने मप्र में फाउंडेशन के माध्यम से अंग एवं देहदान के क्षेत्र में व्याप्त भ्रांतियों को दूर करने के लिए वचनबद्धता व्यक्त की।

फाउंडेशन के सचिव डॉ कृपाशंकर चौबे ने संगोष्ठी का सफल संयोजन करते हुए बताया कि आधिकारिक प्रतीक्षा सूची के अनुसार करीब 2049 बच्चों की जिंदगी की आशा अंगदान पर टिकी हुई, जिनमें 25 फीसद पांच साल से कम के हैं। उन्होंने बताया कि एक जब एक व्यक्ति की मृत देह आठ जिंदगियों में खुशियां बिखेर सकती है तो हमें बगैर पूर्वाग्रह के इस मामले में समाज को समेकित करना चाहिए। संगोष्ठी में देशभर से 14 राज्यों के बाल अधिकार कार्यकर्ताओं ने भाग लिया।

Posted By: Ravindra Soni
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